प्यार और नफ़रत
जैसे प्यार एक दिन में नहीं होता,
वैसे नफ़रत भी कहाँ एक पल में होती है।
पहले कुछ बातें चुभती हैं,
फिर खामोशी दिल में पलती है।
कभी कोई लफ़्ज़ बुरा लगता है,
कभी कोई अंदाज़ बदल जाता है,
कल तक जिसका इंतज़ार था,
आज उसी से मन संभल जाता है।
प्यार भी धीरे-धीरे बढ़ता है—
एक मुलाक़ात, एक भरोसा, एक एहसास लेकर,
और नफ़रत भी धीरे-धीरे जन्म लेती है—
कुछ चोटें, कुछ उपेक्षा, कुछ टूटे विश्वास लेकर।
रिश्ते अचानक नहीं टूटते,
पहले उनमें बातें कम होती हैं,
फिर शिकायतें खामोश हो जाती हैं,
और दूरियाँ खुद-ब-खुद बढ़ती हैं।
एक दिन पता चलता है—
जिसे देखकर कभी चेहरा खिलता था,
आज उसी की मौजूदगी
दिल को भारी कर जाती है।
इसलिए रिश्तों को समय रहते संभाल लेना,
हर खामोशी को सहमति मत समझ लेना।
क्योंकि प्यार बनने में वक्त लगता है,
और नफ़रत बनने में भी…
बस फर्क इतना है—
प्यार यादों को खूबसूरत बनाता है,
और नफ़रत उन्हीं यादों को दर्द।

— कवि गोपाल गावंडे

