कागजों तक सीमित निगरानी: सहायक आयुक्त की ढिलाई से ठेकेदारों के हौसले बुलंद, घटिया निर्माण पर मौन विभाग

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लाखों के बजट पर अफसरों की चुप्पी: जनजातीय विभाग के सहायक आयुक्त का निर्माण कार्यों पर नहीं कोई नियंत्रण
जिला ब्यूरो महेंद्र मालवीय
बुरहानपुर। स्वच्छ भारत अभियान और 'स्वच्छ विद्यालय' के बड़े-बड़े प्रशासनिक दावों की धरातलीय हकीकत मानसून की पहली ही बारिश में पानी-पानी हो गई। आदिम जाति कल्याण विभाग के अंतर्गत आने वाले ग्राम अंबाडा के शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल और ग्राम सारोला के शासकीय हाई स्कूल से घटिया निर्माण और प्रशासनिक अनदेखी का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। कहीं पहली ही बारिश में नए बने शौचालय और मरम्मत किए गए कमरों की छतों से पानी टपक रहा है, तो कहीं छात्र नदी किनारे खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।

मामला 1: अंबाडा शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल
450 से अधिक विद्यार्थियों पर मंडराया खतरा, अधूरे शौचालय में टपका पानी
अंबाडा स्थित शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल में 450 से अधिक छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। यहां विभाग द्वारा बनाए जा रहे बालक एवं बालिका शौचालय का कार्य न केवल अधूरा छोड़ दिया गया, बल्कि पहली ही बारिश में इसकी छत से पानी रिसने लगा।
निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल: पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष अरुण पाटील का आरोप है कि ठेकेदार द्वारा निर्माण में अत्यंत घटिया सामग्री का उपयोग किया गया है। दीवारों पर प्लास्टर सही नहीं है और छत की फिनिशिंग तक पूरी नहीं की गई।
परिसर बना हादसों का केंद्र: स्कूल परिसर में निर्माण सामग्री बेतरतीब ढंग से फैली हुई है। बारिश के कारण फैली कीचड़ और मलबे से बच्चों के फिसलने और घायल होने की आशंका बनी रहती है।

मामला 2: सारोला शासकीय हाई स्कूल
शौचालय के अभाव में नदी किनारे जाने को मजबूर छात्र, मंडराया बड़े हादसे का डर
ग्राम सारोला के शासकीय हाई स्कूल की स्थिति इससे भी अधिक चिंताजनक है। यहां आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा कराए जा रहे मरम्मत कार्य की पहली ही बारिश में कलई खुल गई।
जर्जर भवन और सीलन भरी कक्षाएं: कक्षा 9वीं और 10वीं सहित स्कूल के 7 कमरों, प्राचार्य कक्ष, स्टाफ रूम और प्रैक्टिकल लैब की छत से लगातार पानी टपक रहा है। दीवारों में सीलन आ गई है और प्लास्टर उखड़कर गिर रहा है।
सुरक्षा व्यवस्था शून्य, 100 मीटर दूर उतावली नदी: सारोला में छात्राओं के लिए बन रहा नया शौचालय अधूरा है, जबकि बालकों के लिए शौचालय का निर्माण तक नहीं कराया गया है। मजबूरी में छात्र और शिक्षक खुले में शौच जाने को विवश हैं। स्कूल से महज 100 मीटर की दूरी पर उतावली नदी है। बिना बाउंड्रीवाल वाले इस परिसर से बारिश और तूफान के समय उफनती नदी के पास बच्चों का जाना किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे रहा है।

पढ़ाई ठप, शैक्षणिक सामग्री के खराब होने का खतरा

शिक्षकों के अनुसार, छतों से पानी टपकने और फर्श पर जलभराव होने के कारण लगातार कक्षाएं बदलनी पड़ रही हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। साथ ही, कमरों में रखे बिजली के उपकरणों और महत्वपूर्ण शैक्षणिक दस्तावेजों के खराब होने का भी खतरा पैदा हो गया है।

ग्रामीणों और अभिभावकों का आक्रोश

अभिभावकों और ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन के खिलाफ कड़ा असंतोष व्यक्त करते हुए मांग की है कि:
आदिम जाति कल्याण विभाग के अंतर्गत हुए इन निर्माण और मरम्मत कार्यों की तत्काल तकनीकी जांच कराई जाए।
घटिया निर्माण और कार्य अधूरा छोड़ने वाली ठेकेदार/निर्माण एजेंसी को ब्लैकलिस्ट कर वैधानिक कार्रवाई की जाए।
बालक-बालिका शौचालय का निर्माण कार्य शीघ्र पूर्ण कराकर स्कूल परिसर में बाउंड्रीवाल बनाई जाए।
इस विषय पर जब संकुल प्रभारी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि जनजातीय विभाग के अंतर्गत ये निर्माण कार्य हो रहे है। इनकी मॉनिटरिंग विभाग द्वारा की जा रही है। 

जिम्मेदार साध रहे चुप्पी, फोन काटा
इस पूरे मामले में जब पक्ष जानने के लिए जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त भरत जांचपुरे से उनके मोबाइल नंबर पर फोन के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने विषय सुनने के पहले ही फोन काट दिया। इसके बाद बार-बार प्रयास करने पर भी उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की। जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह मीडिया के सवालों से बचना और चुप्पी साधना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि विभाग निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर कितना संवेदनशील है।

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