पुष्प ब्रांड को हाईकोर्ट से झटका, कमर्शियल कोर्ट का एकतरफा आदेश निरस्त
कॉपी-पेस्ट और यांत्रिक तरीके से आदेश पारित करने पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी, संबंधित न्यायिक अधिकारी के आचरण की प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा के संकेत
राजेश धाकड़
इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने ट्रेडमार्क और कॉपीराइट विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए इंदौर की कमर्शियल कोर्ट द्वारा पारित एकतरफा अंतरिम निषेधाज्ञा एवं जब्ती संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणियां करते हुए कहा कि तथ्यों का समुचित परीक्षण किए बिना यांत्रिक तरीके से आदेश पारित करना न्यायिक प्रक्रिया में स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 12 में संबंधित न्यायिक अधिकारी के आचरण के पहलू पर प्रशासनिक स्तर पर विचार किए जाने की संभावना भी व्यक्त की है।
इस मामले में याचिकाकर्ता 'जैन का पुष्पा मसाला' के प्रोपराइटर पुष्पेंद्र कुमार जैन की ओर से अधिवक्ता सागर चौबे और अधिवक्ता सिद्धार्थ शुक्ला ने पैरवी की। याचिकाकर्ता की ओर से उठाई गई प्रक्रियागत आपत्तियों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने 22 जून 2026 को कमर्शियल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुष्प ब्रांड इंडिया लिमिटेड ने 'जैन का पुष्पा मसाला' के खिलाफ ट्रेडमार्क एवं कॉपीराइट उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इंदौर की कमर्शियल कोर्ट में वाणिज्यिक वाद दायर किया था। मामले में कमर्शियल कोर्ट ने 22 जून 2026 को एकतरफा अंतरिम आदेश पारित करते हुए लोकल कमिश्नर नियुक्त किया था। साथ ही संबंधित उत्पादों की जब्ती और उनकी बिक्री पर रोक लगाने संबंधी निर्देश दिए गए थे।
इस आदेश से प्रभावित होकर जैन का पुष्पा मसाला की ओर से हाईकोर्ट में विविध याचिका क्रमांक 4795/2026 दायर की गई। याचिका में निचली अदालत द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और आदेश पारित करने के तरीके पर सवाल उठाए गए थे।
अधिवक्ता सागर चौबे ने उठाए प्रक्रियागत सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सागर चौबे ने हाईकोर्ट के समक्ष दलील दी कि बिना प्रभावित पक्ष को सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिए और एकतरफा आदेश पारित करने के लिए आवश्यक कारणों को समुचित रूप से दर्ज किए बिना कठोर कार्रवाई के निर्देश देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
उन्होंने यह भी बताया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 39 नियम 3ए के अनुसार, एकतरफा निषेधाज्ञा जारी होने की स्थिति में आवेदन का यथासंभव शीघ्र और सामान्यतः 30 दिनों के भीतर निराकरण करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके बावजूद कमर्शियल कोर्ट ने 22 जून 2026 को आदेश पारित करने के बाद अगली तारीख 18 अगस्त 2026 निर्धारित की थी। याचिकाकर्ता की ओर से इस समयांतराल को भी प्रक्रियागत अनियमितता के रूप में उठाया गया।
अधिवक्ता चौबे ने यह मुद्दा भी उठाया कि संबंधित न्यायिक अधिकारी द्वारा पूर्व में नायरा चॉकलेट्स मामले में भी इसी तरह का आदेश पारित किया गया था, जिस पर हाईकोर्ट ने आपत्ति जताई थी।
पैरा 12 में प्रशासनिक समीक्षा का उल्लेख
मामले में हाईकोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी फैसले के पैरा 12 में सामने आई। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ए. वेंकटसुब्बैया नायडू बनाम एस. चेल्लप्पन का उल्लेख करते हुए कहा कि त्रुटिपूर्ण आदेश पारित करने वाले न्यायिक अधिकारियों के संबंध में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई के पहलू पर विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज करने का न्यायिक आदेश पारित करने से फिलहाल परहेज किया, लेकिन स्पष्ट किया कि इस पहलू पर प्रशासनिक स्तर पर विचार किया जा सकता है। इस टिप्पणी को मामले में न्यायिक प्रक्रिया के पालन और निचली अदालतों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हाईकोर्ट ने निरस्त किया आदेश
खंडपीठ ने मामले में निचली अदालत द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए एकतरफा आदेश पारित करने में आवश्यक सावधानियों और कानूनी प्रावधानों के पालन पर जोर दिया। हाईकोर्ट ने अपनी पर्यवेक्षी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 22 जून 2026 के कमर्शियल कोर्ट के आदेश को निरस्त कर याचिका स्वीकार कर ली।
इस फैसले से 'जैन का पुष्पा मसाला' के प्रोपराइटर पुष्पेंद्र कुमार जैन को राहत मिली है। वहीं, हाईकोर्ट की टिप्पणियों ने एकतरफा निषेधाज्ञा जारी करने के दौरान कानूनी प्रक्रिया, तथ्यों के परीक्षण और न्यायिक विवेक के उचित इस्तेमाल के महत्व को फिर रेखांकित किया है।

