पत्रकारिता पर सवाल: क्या सत्ता के करीब जाने की कीमत है सवाल पूछने की ताकत खोना?"

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मध्यप्रदेश में पत्रकारिता की भूमिका पर बहस तेज, लेखक ने उठाए मीडिया के रवैये पर सवाल
राजेश धाकड़
मध्यप्रदेश की पत्रकारिता को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ पत्रकार सत्ता के करीब रहने के चलते अपनी सवाल पूछने की भूमिका से पीछे हट रहे हैं।

इसी संदर्भ में एक उदाहरण देते हुए कहा गया कि एक सांप ने महात्मा से शिकायत की कि लोग उसे परेशान करते हैं। महात्मा ने उसे लोगों को नुकसान पहुंचाना छोड़ने की सलाह दी थी, लेकिन सांप ने काटना तो छोड़ दिया, फुफकारना भी छोड़ दिया। संदेश यही था कि विनम्रता जरूरी है, लेकिन अपनी ताकत और पहचान खत्म करना नहीं।

लेख में पत्रकारिता से जुड़े कुछ घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए सवाल उठाया गया कि क्या मीडिया को अपनी स्वतंत्रता और सवाल करने का अधिकार बनाए रखना चाहिए।

ग्वालियर की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का उदाहरण देते हुए कहा गया कि पत्रकारों और नेताओं के बीच संवाद की भाषा में बदलाव देखने को मिल रहा है। वहीं भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में पत्रकारों के सवाल पूछने के अवसर सीमित होने को लेकर भी सवाल खड़े किए गए।

लेख में उज्जैन जमीन विवाद से जुड़ी मीडिया कवरेज का भी उल्लेख किया गया और कहा गया कि बड़े मुद्दों पर मीडिया की सक्रियता और निष्पक्षता जरूरी है।

लेखक ने अंत में पत्रकारों से अपील करते हुए कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, पत्रकारिता की असली ताकत सवाल पूछने और सच सामने लाने में है।

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