164 बच्चों की ‘रेस्क्यू’ कार्रवाई पर उठे सवाल—क्या संवैधानिक अधिकारों का हुआ उल्लंघन ?

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परिजनों की सहमति से पढ़ाई के लिए जा रहे थे बच्चे, छह दिन से बाल गृहों में निरुद्ध—माता-पिता की पीड़ा और न्याय की पुकार
कटनी से जिला ब्यूरो नवल किशोर कुशवाहा 
कटनी। बिहार से महाराष्ट्र ले जाए जा रहे 164 बच्चों को कटनी रेलवे स्टेशन पर जीआरपी द्वारा उतारकर मानव तस्करी की आशंका में कार्रवाई की गई। बच्चों को कटनी और जबलपुर के बाल गृहों में भेज दिया गया, जहां वे पिछले छह दिनों से निरुद्ध हैं। इस कार्रवाई के बाद बच्चों को ले जाने वाले लोगों पर मानव तस्करी का गंभीर मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।
हालांकि, अब इस पूरे घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया है। बच्चों के परिजनों का कहना है कि वे मजदूरी के लिए नहीं, बल्कि अपनी सहमति से शिक्षा प्राप्त करने हेतु महाराष्ट्र के मदरसों में भेजे जा रहे थे।
परिजन लगातार लंबा सफर तय कर कटनी पहुंच रहे हैं और रेलवे पुलिस के समक्ष बयान दर्ज करा रहे हैं कि बच्चों को उनकी अनुमति से पढ़ने के लिए भेजा गया था। भीषण गर्मी में माता-पिता की यह पीड़ा मानवीय संवेदनाओं को झकझोर रही है।
सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में अररिया निवासी मोहम्मद शौकत, मोहम्मद शाहिद सहित अन्य अभिभावकों ने स्पष्ट किया है कि उनके बच्चे शिक्षा के उद्देश्य से जा रहे थे। एक मां ने भावुक होकर अपने 11 वर्षीय बेटे की रिहाई की गुहार लगाई है।
स्थानीय समाजसेवियों ने भी इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कुछ बच्चों के पिता स्वयं उनके साथ यात्रा कर रहे थे, जिन्हें भी हिरासत में ले लिया गया। उनका तर्क है—“कोई पिता अपने ही बच्चे की तस्करी कैसे कर सकता है?”
वहीं पुलिस का कहना है कि बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है और स्थानीय प्रशासन से सत्यापन कराया जा रहा है। बाल कल्याण समिति के निर्देशों के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी।

यह मामला अब केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बनता जा रहा है।
भारत के संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21), शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) तथा आवागमन की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) हर नागरिक को प्राप्त है। ऐसे में बिना ठोस प्रमाण के बच्चों को लंबे समय तक निरुद्ध रखना और परिजनों से अलग करना इन अधिकारों के संभावित उल्लंघन की ओर संकेत करता है।
यदि जांच में मानव तस्करी के ठोस साक्ष्य नहीं मिलते, तो यह कार्रवाई सैकड़ों परिवारों के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा का कारण बन सकती है। कई निर्दोष लोग वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकते हैं।
फिलहाल, प्रशासन सत्यापन और जांच की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहा है, लेकिन सवाल यही है—क्या सुरक्षा के नाम पर संवेदनशीलता और संवैधानिक संतुलन कहीं पीछे तो नहीं छूट गया?

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