सहजयोग के माध्यम से ईश्वर की अनुभूति : बाहरी पूजा से आंतरिक जागरण तक
सहज' का अर्थ है 'सह' (साथ) + 'ज' (जन्मा) यानी वह जो आपके साथ जन्मा है, और 'योग' का अर्थ है जुड़ना। यह प्रक्रिया सहज, सुलभ और स्वस्फूर्त है। सहज योग ईश्वरीय अनुभूति पाने का एक बहुत ही सरल और सुगम मार्ग है।
हम अक्सर ईश्वर को मंदिरों, मूर्तियों या बाहरी अनुष्ठानों में खोजते हैं। क्योंकि, बाहरी पूजा-अर्चना मन को शांत करने और ईश्वर के प्रति समर्पण का पहला चरण है। इस, चरण में हम भक्ति मार्ग पर चलते हुये, ईश्वर की आराधना भजन,कीर्तन, उपवास व पूजापाठ से करते हैं जिससे हमें आत्मसंतुष्टि मिलती है। पर, तब भी यदि कहीं न कहीं पूर्ण संतुष्टि का अभाव महसूस होता है, तो हमें समझ लेना चाहिए कि हमारे अंदर ईश्वरीय अनुभूति की प्यास जागृत हो रही है। क्योंकि अंतिम लक्ष्य 'स्वयं को जानना' (आत्म-ज्ञान) ही है। यह आत्मबोध व स्व को समझने या पाने की आकांक्षा है। इस आकांक्षा को सहज योग की भाषा मे शुद्ध इच्छा कहते हैं और सहज योग ज्ञान के लिए शुद्ध इच्छा होनी चाहिए।
सहजयोग के माध्यम से जब साधक आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करता है तब कुंडलिनी माता शक्ति जागृत होकर सुषुम्ना नाड़ी से होती हुई ऊपर उठती है और मस्तिष्क के शीर्ष पर स्थित 'सहस्रार चक्र' तक पहुँचती है।
जब कुंडलिनी की ऊर्जा सहस्रार को पार करती है, तो व्यक्ति का मन वर्तमान में स्थिर हो जाता है और एक ऐसी अवस्था आती है जहाँ मस्तिष्क में कोई विचार नहीं होता। यही ध्यान की सच्ची अवस्था है। जागृति के बाद, व्यक्ति अपने हाथों और शरीर के ऊपर बहती हुई ठंडी या गर्म लहरों (कम्पनों/वाइब्रेशन) के रूप में दिव्य सर्वव्यापी शक्ति (परम चैतन्य) को स्वयं महसूस करने लगता है।
आतंरिक जागरण का यह मार्ग सरल है, ईश्वरीय अनुभूति के लिए सर्वोत्तम है क्योंकि इसके लिए ना आध्यात्मिक मंत्रों का ज्ञान चाहिए ना ही इसका कोई शुल्क है।
विस्तार से सहज योग को जानने हेतू और आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से प्राप्त कर सकते हैं।
सहज योग सदैव नि:शुल्क है।

