पछतावा
उम्र गुजर गई, तब समझ में आया,
ज़िंदगी तो जीनी थी,
पर हम उसे टालते ही रह गए।
वक़्त की रफ़्तार को हल्का समझा,
और एक दिन वही वक़्त
हमसे बहुत आगे निकल गया।
दौलत कमाने में इतने व्यस्त रहे,
कि रिश्तों की दौलत खो बैठे।
घर तो बड़ा बना लिया,
मगर अपनों के लिए
दिल का दरवाज़ा छोटा कर बैठे।
जब तक माँ-बाप साथ थे,
सोचा—अभी तो बहुत समय है।
जब समय मिला,
तब उनके बिना घर ही सूना था।
बच्चे बड़े हो गए,
दोस्त बिछड़ गए,
अपने दूर हो गए,
और हम बस यही सोचते रह गए—
"काश... थोड़ा समय उन्हें भी दिया होता।"
ज़िंदगी का सबसे बड़ा सत्य यही है—
हर काम का एक सही समय होता है।
जो समय निकल गया,
वह फिर कभी लौटकर नहीं आता।
इसलिए आज ही प्रेम कर लीजिए,
आज ही माफ़ कर दीजिए,
आज ही अपने सपनों पर काम शुरू कर दीजिए,
और आज ही अपनों का हाथ थाम लीजिए।
क्योंकि उम्र के आख़िरी पड़ाव पर
न बैंक बैलेंस याद आता है,
न शोहरत, न पद, न पहचान...
बस एक ही आवाज़
मन के भीतर गूँजती है—
"काश...
ज़िंदगी को समय रहते जी लिया होता।"
समय को मत टालिए,
समय के साथ चलिए।
वरना एक दिन
समय आगे निकल जाएगा,
और पीछे रह जाएगा—
सिर्फ़ पछतावा।

कवि: गोपाल गावंडे

