ईश्वर से एकाकारिता की आकांक्षा ही धर्म है
जीवन में सुख और संघर्ष दोनों ही स्वाभाविक हैं। कठिन परिस्थितियों में अधिकांश लोग ईश्वर का स्मरण करते हैं, किंतु वास्तविक आध्यात्मिकता तब प्रकट होती है जब व्यक्ति सुख और संतोष के क्षणों में भी परमात्मा से जुड़ा रहे। यही निरंतर जुड़ाव जीवन की स्थायी शांति और संतुष्टि का आधार बनता है।
सहज योग का संदेश है कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि संसार की अधिकांश उपलब्धियाँ यहीं रह जाती हैं, जबकि उसके साथ केवल उसका धर्म और आध्यात्मिक विकास ही आगे बढ़ता है। धर्म केवल पूजा-पद्धति या बाहरी अनुष्ठानों का नाम नहीं, बल्कि परमात्मा को प्राप्त करने की सच्ची और शुद्ध आकांक्षा है। जब मनुष्य के भीतर यह आकांक्षा जागृत होती है, तभी उसका जीवन पवित्रता और दिव्यता की ओर अग्रसर होने लगता है। पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए संघर्ष करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। ऐसे समय में सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना स्वाभाविक है, लेकिन जब हमारी प्रार्थना केवल सांसारिक इच्छाओं तक सीमित होती है, तब उसका उद्देश्य पूर्णतः शुद्ध नहीं होता। सहज योग व्यक्ति को अपनी सामान्य इच्छाओं को शुद्ध इच्छा में रूपांतरित करने का मार्ग प्रदान करता है। यही शुद्ध इच्छा साधक को परमात्मा के चित्त में स्थान दिलाती है और उसके जीवन में आंतरिक परिवर्तन का आरंभ करती है।
परमपूज्य श्री माताजी निर्मला देवी ने कहा है—"एक बार जब आप सच्चाई को धारण कर लेते हैं तो आपका अपना जीवन ही लोगों को विश्वास दिलाएगा कि आप दिव्य हैं। जो कुछ भी आप करते हैं, वह लोगों को यकीन देगा कि आप दिव्य हैं, और जो कुछ भी आप कहेंगे, लोग जान जाएंगे कि यह दिव्य शक्ति से आ रहा है।"
जब व्यक्ति ईश्वर के चित्त में स्थापित होकर जीवन जीने लगता है, तब उसके लिए जिम्मेदारियाँ बोझ नहीं रह जातीं, बल्कि सहजता से निभने लगती हैं। आंतरिक शांति, संतुलन और आत्मिक आनंद उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। यही सहज योग का वास्तविक उद्देश्य है—आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर स्थित दिव्य शक्ति का अनुभव कराना।
आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने तथा अपने निकटतम सहज योग ध्यान केंद्र की जानकारी के लिए टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800 या वेबसाइट sahajayoga.org.in पर संपर्क किया जा सकता है।

