सहजयोग - अंतर्मन की आनंदमयी यात्रा

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कस्तूरीमृग की कथा हम सभी ने सुनी है। उसकी नाभि में स्थित कस्तूरी की दिव्य सुगंध पूरे वन में फैलती है। वह स्वयं भी उस मनमोहक सुगंध का अनुभव करता है, किंतु यह नहीं जान पाता कि उसका स्रोत उसी के भीतर है। उस सुगंध की खोज में वह जंगल-जंगल भटकता है, दौड़ता है, थक जाता है, परंतु अंततः उसे वह बाहर कहीं नहीं मिलती।
      मनुष्य की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। हम जीवन भर सुख, शांति, आनंद और संतोष को धन, पद, प्रतिष्ठा, परिवार, व्यवसाय और भौतिक उपलब्धियों में खोजते रहते हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करते हैं, फिर भी मन की गहराइयों में वह पूर्ण तृप्ति और स्थायी आनंद प्राप्त नहीं हो पाता जिसकी हमें तलाश रहती है।
परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी जी बताती हैं कि जिस आनंद की खोज में मनुष्य संसार भर में भटकता है, उसका वास्तविक स्रोत उसके अपने ही भीतर, हृदय रूपी गुफा में स्थित है। सहजयोग के माध्यम से आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होने पर उसी दिव्य चेतना की यात्रा प्रारम्भ होती है और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने लगता है।
श्रीमाताजी कहती हैं कि इस आंतरिक कस्तूरी की सुगंध का अनुभव तभी संभव है जब श्री गणेश जी की कृपा प्राप्त हो। श्री गणेश, जो पवित्रता, निष्कपटता और पृथ्वी तत्व के अधिष्ठाता हैं, साधक के भीतर निर्मलता और संतुलन स्थापित करते हैं। इस अनुभव का सबसे सरल और सहज माध्यम है—ध्यान।
ध्यान के विषय में श्रीमाताजी कहती हैं—"सबसे पहले अपने आप को प्रेम से भर लो। यह जान लो कि मैं आपकी माँ हूँ और माँ होने का अर्थ है संपूर्ण संरक्षण। कोई भी बात गड़बड़ नहीं होने वाली। मेरी ओर अपने हाथ बढ़ाइए, धीरे-धीरे आँखें बंद कीजिए और अपने विचारों को देखिए। जैसे ही आप निर्विचार हो जाएँगे, वैसे ही आप अपने भीतर प्रवेश करने लगेंगे। आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।"
वे आगे कहती हैं कि ध्यान प्रारम्भ करने से पहले हृदय से प्रार्थना करें—"हे प्रभु! जिन्होंने मुझे कष्ट पहुँचाया, मैं उन सबको क्षमा करता हूँ। और मुझे भी क्षमा करें, क्योंकि मैंने भी जाने-अनजाने में अनेक लोगों को दुःख पहुँचाया है।" क्षमा का यह भाव हृदय को निर्मल बनाता है और प्रार्थना को सार्थक करता है। 
आत्मसाक्षात्कार के पश्चात साधक का मिलन सर्वव्यापी चैतन्य शक्ति से हो जाता है। तब उसकी प्रार्थना केवल शब्द नहीं रहती, बल्कि अनुभव बन जाती है। सहजयोग में साधक धीरे-धीरे अपने भीतर स्वतः प्रसन्नता, संतोष, समाधान और आंतरिक सुरक्षा का अनुभव करने लगता है। यदि जीवन में कभी असंतुलन उत्पन्न भी हो, तो आत्मपरीक्षण के माध्यम से वह अपनी त्रुटियों को पहचानकर उन्हें सुधारने का प्रयास करता है। ध्यान से प्राप्त दिव्य आनंद उसे केवल स्वयं तक सीमित नहीं रखता, बल्कि दूसरों के जीवन में भी प्रकाश और शांति बाँटने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार सहजयोग व्यक्ति के व्यक्तित्व, चरित्र और आध्यात्मिक क्षमता के समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। सहजयोग के माध्यम से आत्मसाक्षात्कार का अनुभव करें और अपने भीतर स्थित उस दिव्य आनंद, शांति और प्रेम के स्रोत को पहचानें, जो सदैव से आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
सहजयोग के विषय में अधिक जानकारी के लिए  1800 270 0800 पर  अथवा www.sahajayoga.org.in पर जाकर विस्तृत जानकारी प्राप्त करें।

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