श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित योग की सजीव अनुभूति है सहजयोग

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श्रीमद्भगवद्गीता एक पवित्र ग्रंथ है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में अर्जुन को उपदेश स्वरूप प्रदान किया था। गीता की विशेषता यह है कि यह किसी एक दर्शन, संप्रदाय या विचारधारा तक सीमित न होकर सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देती है। इसका उद्देश्य केवल अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करना नहीं था, बल्कि यह बताना था कि जीवन की किसी भी परिस्थिति में मानव का कल्याण संभव है। गीता में श्रीकृष्ण ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग के माध्यम से परमात्मा से एकत्व प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं, किंतु इन योगों का वास्तविक अर्थ अत्यंत व्यापक एवं गहन है। निष्काम कर्म, निर्विकल्प ज्ञान और अनन्य भक्ति की अवस्था प्राप्त करने के लिए आत्मबोध आवश्यक माना गया है, जबकि परंपरागत मतों के अनुसार आत्मबोध कठिन साधना का परिणाम समझा जाता है। ऐसे में अनेक लोग स्वयं को इस मार्ग के योग्य नहीं मानते।
वर्तमान समय में परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा स्थापित सहजयोग ध्यान आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने का एक सहज एवं व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है। आदिशक्ति स्वरूपा श्री माताजी ने कुंडलिनी जागरण के शाश्वत ज्ञान को पुनः स्थापित किया, जिसके माध्यम से प्रत्येक जिज्ञासु साधक आत्मज्ञान की अनुभूति सहज रूप से प्राप्त कर सकता है। जो साधक श्रद्धा एवं समर्पण के साथ आत्मसाक्षात्कार की इच्छा व्यक्त करता है, वह इसकी अनुभूति अपने तालु और हथेलियों पर शीतल चैतन्य के रूप में अनुभव कर सकता है। नियमित ध्यान और आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से मनुष्य का चित्त वर्तमान में स्थिर होने लगता है और वह गीता में वर्णित कालातीत, गुणातीत तथा धर्मातीत अवस्था की ओर अग्रसर होता है। परिणामस्वरूप जीवन के अनेक मानसिक एवं भौतिक संताप स्वतः कम होने लगते हैं और साधक साक्षीभाव में स्थित होकर परमात्मा से गहन एकाकारिता स्थापित करने में सक्षम होता है। इस प्रकार सहजयोग को श्रीकृष्ण द्वारा गीता में वर्णित योगों की जीवंत एवं प्रत्यक्ष अनुभूति के रूप में देखा जा सकता है।
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