सहजयोग ध्यान : साक्षी भाव और निर्विचारिता की सहज अवस्था

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सहजयोग ध्यान कोई प्रक्रिया नहीं है, बल्कि चेतना की वह सहज अवस्था है जिसमें मनुष्य अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह किसी मानसिक प्रयास, एकाग्रता या विचारों को दबाने का अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् सहज रूप से प्राप्त होने वाली निर्विचार जागरूकता है। जब कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर सहस्रार का द्वार खोलती है, तब विचारों के बीच का अंतराल बढ़ने लगता है और साधक निर्विचार चेतना का अनुभव करता है।
साक्षी भाव के अनेक लाभ हैं। इससे मन की चंचलता कम होती है, तनाव और चिंता घटती है, और व्यक्ति अधिक शांत, संतुलित तथा स्पष्ट दृष्टि वाला बनता है। साक्षी बनकर हम परिस्थितियों को बेहतर समझते हैं, भावनाओं पर अनावश्यक प्रतिक्रिया से बचते हैं, और संबंधों में धैर्य, करुणा तथा मधुरता विकसित होती है। यह आत्म-जागरूकता, आत्मविश्वास और आंतरिक स्थिरता को भी बढ़ाता है।
साक्षी भाव सहजयोग का आधार है। साक्षी बनकर हम अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और परिस्थितियों को केवल देखते हैं, उनसे तादात्म्य नहीं करते। इसी साक्षी भाव में मन शांत होता है, अहं और प्रतिअहं का प्रभाव क्षीण होने लगता है, और भीतर स्थित आत्मा का प्रकाश प्रकट होने लगता है। उस समय ध्यान करना नहीं पड़ता, बल्कि ध्यान स्वयं घटित होता है।
निर्विचार अवस्था ही वास्तविक स्वतंत्रता है। यही वह क्षण है जहाँ वर्तमान जीवंत हो उठता है, परमात्मा की चैतन्य शक्ति का अनुभव होता है और जीवन प्रेम, करुणा, शांति तथा आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। सहजयोग का संदेश अत्यंत सरल है—अपने भीतर स्थित दिव्यता को जागृत कीजिए, साक्षी भाव में स्थित रहिए, और निर्विचार चेतना में परमात्मा के प्रेम एवं चैतन्य का निरंतर अनुभव कीजिए। यही सहजयोग है, यही आत्मसाक्षात्कार का सच्चा आनंद है।
सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800-2700-800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं। सहजयोग पूर्णतया निशुल्क है।

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