आत्मरूपी दर्पण का दर्शन ही धर्म पथ की यात्रा का प्रारंभ है

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सहजयोग ध्यान हमें बाहरी भौतिक संसार की निरंतर भागदौड़ से कुछ क्षण स्वयं की ओर लौटने का अवसर प्रदान करता है। श्री माताजी प्रणित सहजयोग की साधना के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर स्थित आत्मस्वरूप को जानने और अपने आंतरिक सौंदर्य का अनुभव करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
    हमारी पांच ज्ञानेंद्रियां हमें बाहरी संसार का अनुभव कराती हैं। हम अपने आसपास की वस्तुओं, लोगों और प्रकृति को देख सकते हैं, सुन सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं, लेकिन अपने भीतर के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए अंतर्मुखी होना आवश्यक है। सहजयोग में आत्मसाक्षात्कार की अवस्था को इसी आंतरिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया है।
       जब कुंडलिनी जागृत होकर सहस्रार की ओर आरोहण करती है, तो साधक के भीतर धर्म और विवेक की चेतना जागृत होने लगती है। यह अनुभूति किसी बाहरी प्रदर्शन या किसी पर थोपे जाने वाली वस्तु नहीं है। धर्म का वास्तविक आनंद प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने भीतर अनुभव करना होता है।
     जिस प्रकार किसी को दान देने का भाव व्यक्ति और परमात्मा के बीच का निजी संबंध होता है और उसमें बाहरी दिखावे की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार आत्मिक गुणों और पवित्रता का आनंद भी मूलतः व्यक्तिगत अनुभूति है। कोई व्यक्ति गुणी हो तो उसके गुणों का सम्मान और समर्थन किया जा सकता है, लेकिन उसके अंतर्मन में प्रवाहित होने वाले आनंद का अनुभव कोई  उसके स्थान पर नहीं कर सकता।
   श्री माताजी ने आत्मा और आत्मसाक्षात्कार को समझाने के लिए दर्पण का सुंदर दृष्टांत दिया है। ईश्वर को सौंदर्य का स्रोत माना जाता है, लेकिन अपने ही स्वरूप को देखने के लिए उन्हें भी एक दर्पण की आवश्यकता होगी। जैसे मोती अपने भीतर छिपे सौंदर्य को स्वयं नहीं देख सकता, आकाश अपनी विशालता को स्वयं नहीं निहार सकता और सूर्य अपनी ही प्रभा को सीधे नहीं देख सकता, उसी प्रकार परम सत्ता ने इस सृष्टि को अपने प्रतिबिंब के रूप में रचा है।
   प्रकृति की विविध रचनाओं के बाद मनुष्य की सृष्टि हुई। अनेक अनुभवों और जीवन यात्राओं के पश्चात प्राप्त इस मानव जीवन को यदि मनुष्य केवल नशे, अतिवाद, भौतिक आकर्षण और बाहरी उपलब्धियों में उलझाकर व्यतीत कर दे, तो वह अपने भीतर छिपी संभावनाओं से दूर रह जाता है।
श्री माताजी का संदेश है कि मनुष्य जब तक स्वयं को नहीं पहचानता, तब तक उसे अपनी वास्तविक महानता और आंतरिक आनंद का बोध नहीं हो पाता। सहजयोग साधना आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से इसी आत्म पहचान की दिशा में मार्ग प्रशस्त करती है।
   आत्मसाक्षात्कार के पश्चात जब साधक अपनी चेतना और चित्त को आत्मा की ओर केंद्रित करता है, तो वह अपने भीतर के वास्तविक स्वरूप का प्रतिबिंब देखने की दिशा में बढ़ता है। इस आंतरिक जागरूकता के साथ कुविचार, कुसंस्कार और स्वयं को नुकसान पहुंचाने वाली प्रवृत्तियों से दूरी बनाना सहज हो जाता है तथा मनुष्य अपनी पवित्रता, संतुलन और आंतरिक आनंद को स्वयं अनुभव करता है।
नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी  टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in  से प्राप्त कर सकते हैं।

 

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