जिंदगी से हार चुकी थी कलेक्टर की जनसुनवाई ने दे दी नई जिंदगी - द्वारिका की कहानी
सह संपादक अनिल चौधरी
कुछ कहानियां सिर्फ खबर नहीं होतीं, वो भरोसे की मिसाल बन जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है द्वारिका प्रजापति की, जो अपने पति और दो मासूम बच्चों के साथ जिंदगी खत्म करने जा रही थी, लेकिन इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा की जनसुनवाई ने उसे जीने की नई वजह दे दी और आज वही द्वारिका अपने हाथों से टिफिन में खाना और मिठाई बनाकर कलेक्टर कार्यालय पहुंची। आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान लिए बोली - "मेरा कोई नहीं है कलेक्टर साहब ही मेरे भैया हैं जब सब कुछ खत्म लगने लगा था द्वारिका के पति जेसीबी ऑपरेटर थे। परिवार हंसी-खुशी चल रहा था, लेकिन दर्द की दवाइयों ने सब बिगाड़ दिया। 5 साल पहले दोनों किडनियां फेल हो गईं, अब लीवर भी खराब है। हफ्ते में तीन बार डायलिसिस इलाज में घर-बार सब बिक गया। रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया। दो छोटे बच्चों के साथ द्वारिका अकेली रह गई। काम मांगने जाती तो कोई देता नहीं। एक वक्त ऐसा आया जब अस्पताल जाने तक के पैसे नहीं बचे। थक-हार कर पूरे परिवार ने आत्महत्या करने का फैसला कर लिया।एक आखिरी उम्मीद - कलेक्टर से मिलना इसी बीच किसी ने बताया कि कलेक्टर जनसुनवाई करते हैं। द्वारिका एक आखिरी उम्मीद लेकर कलेक्टर शिवम वर्मा के पास पहुंची कलेक्टर शिवम वर्मा ने बताया - प्रजापति जी काफी निराश और परेशान थीं। जब मामला संज्ञान में आया तो हमने तुरंत मदद की। उनके पति का इलाज कराया और मुख्यमंत्री जी के निर्देशन में उन्हें रोजगार से जोड़ा कलेक्टर की पहल पर द्वारिका को दुकान और ठेला शुरू करवाया गया आज खुद के पैरों पर खड़ी है द्वारिका आज द्वारिका रोज 1000 रुपये कमा रही है। पति का इलाज चल रहा है, बच्चे स्कूल जा रहे हैं द्वारिका कहती हैं इतनी तंगी थी कि लगा मर जाना ही ठीक है। सोचा आखिरी बार कलेक्टर साहब से मिल लेते हैं। उन्होंने मेरी सुनी, मेरी जिंदगी बचा ली। आज जो मौत के मुंह से निकाल कर जीना सिखाए, वो भाई से बढ़कर ही तो है इंदौर कलेक्टर की जनसुनवाई आज सिर्फ फरियाद सुनने का मंच नहीं, बल्कि किसी की टूटी जिंदगी को फिर से जोड़ने का आशीर्वाद बन गई है।

