खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे या युवाओं के सवालों का जवाब दे?
इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ ने रोजगार, संविदा, निजीकरण और शिक्षा व्यवस्था के सवालों को सड़क पर ला दिया
राजेश धाकड़
इंदौर की जमीन पर शनिवार को सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं हुआ। वहां एक पूरी पीढ़ी ने अपनी बेचैनी माइक पर रख दी। नाम था ‘छात्रों की गूंज’। मंच पर राहुल गांधी थे, लेकिन असली आवाज छात्रों की थी। किसी ने संविदा व्यवस्था पर सवाल उठाया, किसी ने निजीकरण पर चिंता जताई, किसी ने सरकारी भर्तियों में देरी की बात कही तो किसी ने विश्वविद्यालयों की व्यवस्था और पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए। राहुल गांधी ने इसे ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ का सवाल बताया और छात्रों से कहा कि व्यवस्था नहीं चाहती कि विद्यार्थी सवाल पूछें।
अब भाजपा का जवाब भी सामने आया। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने राहुल गांधी के कार्यक्रम को ‘झूठ की गूंज’ बताया। यानी इंदौर में छात्र बोल रहे थे और राजनीति अपना-अपना माइक लेकर जवाब दे रही थी। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर में सबसे जरूरी सवाल कहीं दबना नहीं चाहिए कि आखिर छात्र कह क्या रहे हैं?
क्योंकि राहुल गांधी का मंच कांग्रेस का हो सकता है, भाजपा की प्रतिक्रिया राजनीतिक हो सकती है, ‘छात्रों की गूंज’ और ‘झूठ की गूंज’ के पोस्टर लगाए जा सकते हैं, लेकिन बेरोजगारी का दर्द किसी पार्टी का नहीं होता। भर्ती की प्रतीक्षा किसी विचारधारा की नहीं होती। परीक्षा में बैठने वाला छात्र पहले छात्र होता है, बाद में किसी दल का समर्थक या विरोधी।
इंदौर में युवाओं ने संविदा प्रथा और निजीकरण को लेकर जिस तरह अपनी नाराजगी रखी, उसे केवल कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बताकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होंगे। युवाओं का सवाल सीधा है कि सरकारी विभागों में जब पद खाली हैं तो नियमित भर्तियां क्यों नहीं हो रही हैं? भर्ती प्रक्रिया निकलती है तो समय पर पूरी क्यों नहीं होती? परीक्षा हो जाती है तो परिणाम और नियुक्ति के बीच वर्षों का अंतर क्यों आ जाता है? आखिर एक युवा अपनी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण समय फॉर्म भरने, परीक्षा देने और परिणाम का इंतजार करने में क्यों गुजारे?
एक छात्र ने राहुल गांधी के सवाल के जवाब में कहा कि औसत छात्र भी रोजगार पा सकता है, क्योंकि सरकारी महकमों में बहुत सारे पद खाली हैं, लेकिन परेशानी यह है कि सरकारें या तो भर्तियां निकालती नहीं हैं या प्रक्रिया बीच में रोक दी जाती है। इस दावे का पूरा सरकारी आंकड़ों के आधार पर परीक्षण होना चाहिए, लेकिन सवाल इतना गंभीर जरूर है कि सरकार को रिक्त पदों और भर्ती प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। युवा नौकरी मांग रहा है, नौकरी की भीख नहीं।
वह कह रहा है कि अगर सरकारी विभाग में काम है, पद स्वीकृत हैं और कर्मचारी की जरूरत है तो भर्ती कीजिए। परीक्षा लीजिए, परिणाम दीजिए और नियुक्ति कीजिए। यदि भर्ती किसी कानूनी, प्रशासनिक या आरक्षण संबंधी कारण से अटकती है तो युवाओं को स्पष्ट जानकारी दीजिए। आखिर वे भी इस देश के नागरिक हैं, जिनसे परीक्षा शुल्क लिया जाता है, जिनसे दस्तावेज लिए जाते हैं और जिनसे वर्षों मेहनत की अपेक्षा की जाती है।
देश का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में सिर्फ किताबें नहीं पढ़ता, वह अपने परिवार की उम्मीद भी साथ लेकर चलता है। माता-पिता फीस भरते हैं, बच्चे शहर बदलते हैं, कमरे का किराया देते हैं, कोचिंग करते हैं, दिन-रात पढ़ते हैं और फिर परीक्षा की तारीख का इंतजार करते हैं। परीक्षा हो जाए तो परिणाम का इंतजार और परिणाम आ जाए तो नियुक्ति का इंतजार। कई बार युवा की सबसे बड़ी नौकरी ही नौकरी पाने का इंतजार बन जाती है।
ऐसे में जब वही युवा संविदा व्यवस्था देखता है तो उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसका भविष्य भी संविदा पर है?
सरकारी काम स्थायी है, विभाग स्थायी हैं, योजनाएं वर्षों चलती हैं और पदों की जरूरत भी स्थायी रहती है, लेकिन कर्मचारी को संविदा, आउटसोर्सिंग या अस्थायी व्यवस्था के हवाले कर दिया जाता है। संविदा व्यवस्था के पक्ष में सरकारों के अपने प्रशासनिक और वित्तीय तर्क हो सकते हैं, निजीकरण के पक्ष में भी तर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इसका अंतिम असर कर्मचारी और आम नागरिक पर क्या पड़ता है।
अगर निजीकरण से सेवा बेहतर होती है तो उसका हिसाब सामने आना चाहिए। अगर सरकारी व्यवस्था कमजोर है तो उसे मजबूत करने की योजना सामने आनी चाहिए। अगर संविदा व्यवस्था जरूरी है तो कर्मचारियों के भविष्य और सेवा सुरक्षा की नीति स्पष्ट होनी चाहिए। केवल निजीकरण या संविदा शब्द बोल देने से बहस खत्म नहीं होती। युवाओं को जवाब चाहिए।
यही वह जगह है जहां राजनीति अक्सर मुद्दे से भटक जाती है। राहुल गांधी ने इंदौर में ‘सिस्टम’ पर सवाल उठाए और ‘अंधभक्त’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए अपनी राजनीतिक व्याख्या रखी। उनके अनुसार अंधभक्त वह है जो सवाल नहीं पूछता और छात्रों के सवालों तथा ईमानदारी के बजाय नफरत की राजनीति करता है। भाजपा ने राहुल गांधी के आरोपों और कार्यक्रम को चुनौती देते हुए इसे ‘झूठ की गूंज’ कहा।
अब दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक तर्क रख सकते हैं। जनता तय करेगी कि किसका तर्क उसे स्वीकार है। लेकिन एक बात पर शायद किसी विवाद की जरूरत नहीं कि छात्र को सवाल पूछने का अधिकार है।
विश्वविद्यालय का अर्थ ही सवाल है। शिक्षा का अर्थ ही सवाल है। अगर विद्यार्थी फीस बढ़ने पर सवाल नहीं पूछ सकता, परीक्षा में देरी पर सवाल नहीं पूछ सकता, भर्ती रुकने पर सवाल नहीं पूछ सकता, विश्वविद्यालय की व्यवस्था पर सवाल नहीं पूछ सकता तो फिर शिक्षा संस्थान और प्रशिक्षण केंद्र में अंतर क्या रह जाएगा?
इंदौर के कार्यक्रम में एक छात्रा ने विश्वविद्यालयों की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि जिस सिस्टम का उद्देश्य विश्वविद्यालयों को बचाना है, वही छात्रों पर भारी पड़ रहा है। उसने संस्थानों में सहयोग की कमी और फर्जीवाड़े की शिकायत भी रखी। इन आरोपों को अपने आप में प्रमाण नहीं माना जा सकता और इनकी स्वतंत्र जांच जरूरी है, लेकिन किसी छात्र की शिकायत को केवल इसलिए खारिज भी नहीं किया जा सकता कि वह राजनीतिक मंच पर सामने आई है।
सरकार का काम शिकायत को दबाना नहीं, उसकी जांच कराना है। शिकायत गलत है तो तथ्य सामने रखिए और शिकायत सही है तो कार्रवाई कीजिए। यही लोकतंत्र है।
इंदौर में राहुल गांधी के कार्यक्रम को लेकर जगह का विवाद भी खूब चर्चा में रहा। कार्यक्रम के लिए स्थान को लेकर खींचतान हुई और अंततः वैकल्पिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम से पहले ‘झूठ की गूंज’ जैसे पोस्टर भी लगाए गए। राजनीति ने अपना जवाब तैयार कर लिया, लेकिन मैदान बदलने से सवाल नहीं बदले।
छात्र स्टेडियम में हो या किसी मैदान में, कॉलेज में हो या सड़क पर, सवाल वही रहेगा रोजगार कहां है? यही वह सवाल है जिससे राजनीति बच नहीं सकती।
सरकार के पास रोजगार के बेहतर आंकड़े हैं तो सामने रखिए। रिक्त पदों की संख्या अलग है तो बताइए। भर्ती का कैलेंडर है तो सार्वजनिक कीजिए। राहुल गांधी का कोई दावा गलत है तो भाजपा तथ्य के साथ उसका जवाब दे। भाजपा का कोई दावा गलत है तो कांग्रेस तथ्य के साथ जवाब दे। लेकिन ‘झूठ’ और ‘अंधभक्ति’ के राजनीतिक नारों में छात्र का भविष्य गायब नहीं होना चाहिए।
भाजपा की ओर से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी की जीत को राहुल गांधी की छात्र राजनीति के जवाब के रूप में पेश किया गया। यह भाजपा की राजनीतिक प्रतिक्रिया है और उसे अपने संगठन तथा छात्र राजनीति की उपलब्धियां बताने का पूरा अधिकार है। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव परिणाम मध्यप्रदेश के हर छात्र की राय का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मध्यप्रदेश के युवा की अपनी समस्याएं हैं। उसे अपने प्रदेश में भर्ती चाहिए, अपने विश्वविद्यालय में पारदर्शिता चाहिए, अपने शहर में रोजगार चाहिए और प्रतियोगी परीक्षाओं की ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें उसकी मेहनत बार-बार व्यवस्था की खामियों की बलि न बने। युवा किसी पार्टी की जागीर नहीं है।
आज वह राहुल गांधी की बात सुन सकता है, कल भाजपा के नेता की बात सुन सकता है और फिर दोनों से सवाल कर सकता है। यही लोकतंत्र है। युवा को किसी पार्टी का समर्थक या विरोधी घोषित करने से पहले उसकी समस्या सुननी होगी।
किसी छात्र को बेरोजगारी की शिकायत करने पर राजनीतिक मत बताइए। किसी विद्यार्थी को व्यवस्था पर सवाल उठाने पर विरोधी मत बताइए। क्योंकि सवाल पूछने वाला छात्र ही कल वह नागरिक बनेगा जो सरकार से हिसाब मांगेगा। और जिस दिन छात्र सवाल पूछना छोड़ देगा, उस दिन सत्ता चाहे किसी की भी हो, लोकतंत्र कमजोर होगा।
राहुल गांधी ने इंदौर में ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ की बात की। भाजपा ने इसे चुनौती दी और ‘झूठ की गूंज’ के रूप में जवाब दिया। लेकिन असली जरूरत इस बहस को ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ से निकालकर ‘सिस्टम और स्टूडेंट्स’ बनाने की है।
सरकार छात्र के सामने नहीं, छात्र के साथ खड़ी हो। विश्वविद्यालय छात्र के खिलाफ नहीं, छात्र के साथ खड़ा हो। भर्ती व्यवस्था युवा को इंतजार कराने वाली मशीन नहीं, अवसर देने वाली व्यवस्था बने। और राजनीति युवा को सिर्फ वोटर समझने के बजाय नागरिक समझे। क्योंकि चुनाव के समय युवा एक वोट है, लेकिन लोकतंत्र में वह पूरे पांच साल नागरिक है।
इसलिए अब खंभा नोचने से काम नहीं चलेगा। ‘छात्रों की गूंज’ का जवाब ‘झूठ की गूंज’ से देने से भी काम नहीं चलेगा। जवाब चाहिए तो भर्ती का कैलेंडर सामने रखिए। सवाल है तो आंकड़े दीजिए। शिकायत है तो जांच कराइए। गलती है तो कार्रवाई कीजिए और युवा भविष्य मांग रहा है तो उसे भविष्य की स्पष्ट तस्वीर दीजिए। क्योंकि इंदौर में इस बार केवल राहुल गांधी नहीं बोले।
एक पीढ़ी बोल रही थी। और पीढ़ियां जब बोलना शुरू करती हैं तो उनके सवाल पोस्टरों से नहीं दबते, प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं रुकते और राजनीतिक नारों से खत्म नहीं होते। उनका जवाब देना ही पड़ता है।
खिसियानी बिल्ली चाहे जितना खंभा नोचे, युवा अब खंभे को नहीं जवाब को देख रहा है।और यही लोकतंत्र की असली गूंज है।

