श्राद्ध केवल कर्मकांड नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और जीवन में श्रेष्ठ परिवर्तन का संकल्प है- ब्रह्माकुमारी रेखा दीदी
श्राद्ध के 16 दिन हमें माता-पिता एवं पूर्वजों के संस्कारों को जीवन में अपनाने और जीते-जी उनकी सेवा करने का देते हैं संदेश
धर्मेन्द्र गुप्ता की रिपोर्ट
विदिशा। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय चर्च वाली गली रोड स्थित सेवा केंद्र द्वारा बेतवा तट रिपटा घाट पर जाकर संदेश दिया गया की श्राद्ध शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। जब हम श्रद्धा और विश्वास के साथ कोई कार्य करते हैं तो हमारे भाव और संकल्पों का प्रभाव वातावरण तक पहुंचता है। श्रद्धा के साथ जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके प्रति शुद्ध संकल्प और कृतज्ञता के भाव अर्पित करते हैं, तो यही वास्तविक अर्थों में श्राद्ध है। श्राद्ध केवल पूर्वजों को याद करने की एक क्रिया नहीं, बल्कि उनके श्रेष्ठ गुणों, संस्कारों और कर्तव्यों को स्मरण कर उन्हें अपने जीवन में उतारने का अवसर है। यह आध्यात्मिक विचार ब्रह्माकुमारी रेखा दीदी ने श्राद्ध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि श्राद्ध के समय प्रत्येक व्यक्ति अपने माता-पिता और पूर्वजों के अच्छे गुणों, उनके त्याग, सेवा, संस्कार और कर्तव्यों को याद करता है। हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन में जो श्रेष्ठ कार्य किए, उन मूल्यों को हम भी अपने जीवन में अपनाएं। उन्होंने कहा कि जाने-अनजाने में हमसे कई बार ऐसी गलतियां हो जाती हैं, जिससे हमारे माता-पिता अथवा किसी प्रियजन का मन दुखता है। श्राद्ध का समय हमें आत्मचिंतन करने का अवसर देता है। हमें अपने पूर्वजों के प्रति सच्चे हृदय से क्षमा मांगनी चाहिए, अपनी भूलों का प्रायश्चित करना चाहिए और स्वयं में सकारात्मक परिवर्तन लाने का शुद्ध संकल्प लेना चाहिए। यही सच्ची श्रद्धा है। आगे दीदी ने कहा कि श्रद्धा केवल एक क्रिया पूरी कर लेने का नाम नहीं है, बल्कि यह पूर्वजों के प्रति हमारे भाव, सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है। व्यक्ति जब समय निकालकर अपने पितरों की अच्छाइयों को याद करता है और उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में धारण करने का संकल्प लेता है, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। श्राद्ध के 16 दिन आत्मचिंतन और शुभ संकल्पों के लिए विशेष माने जाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से आशीर्वाद और श्राप किसी व्यक्ति के जीवन को केवल बाहरी रूप से प्रभावित नहीं करते, बल्कि व्यक्ति के कर्म ही उसके जीवन के परिणामों का आधार बनते हैं। इसलिए हमें अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कर्ण की प्रचलित कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कथा हमें अपने कर्मों और जीवन के वास्तविक मूल्यों पर विचार करने की प्रेरणा देती है। यदि माता-पिता अपने बच्चों के जीवित रहते हुए उनके प्रति प्रेम, स्नेह और आशीर्वाद बरसाते हैं, तो उनके शरीर छोड़ने के बाद उनके रुष्ट होने की कल्पना करने के बजाय हमें उनके प्रति अपने कर्तव्यों और संस्कारों को समझना चाहिए। ब्रह्माकुमारी रुक्मणी दीदी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि श्राद्ध का वास्तविक संदेश यही है कि जीते-जी माता-पिता की सेवा करें, उन्हें सम्मान दें, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें और उन्हें प्रसन्न रखें। उनके जीवित रहते हुए यदि हमें उनका आशीर्वाद प्राप्त हो जाए तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है। उनके आशीर्वाद और शुभकामनाओं से जीवन में उत्साह, शक्ति और सकारात्मकता का अनुभव होता है। आज समाज में ऐसी घटनाएं भी देखने को मिलती हैं, जब कुछ लोग अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं, उनकी आवश्यकताओं और भावनाओं की उपेक्षा करते हैं, लेकिन उनके देहांत के बाद श्राद्ध एवं अन्य कर्मकांड करते हैं। ऐसे में हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या केवल बाद में किए गए कर्मकांड हमारे उन कर्मों की भरपाई कर सकते हैं, जिनसे माता-पिता का हृदय जीवन भर दुखी रहा? इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन भर अच्छे कर्म करें, माता-पिता की सेवा करें, उन्हें संतुष्ट और तृप्त रखें। उन्होंने कहा कि पितृ अर्थात हमारे माता-पिता और पूर्वज, जिनके कारण हमारा अस्तित्व है। उनके प्रति हमारा ऋण केवल कर्मकांडों से नहीं, बल्कि सेवा, सम्मान, सद्भावना और उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में धारण करके ही चुकाया जा सकता है। यही श्राद्ध का वास्तविक आध्यात्मिक महत्व है। श्राद्ध हमें यह संदेश देता है कि अपने पूर्वजों को केवल एक निश्चित अवधि में स्मरण करने के बजाय उनके श्रेष्ठ गुणों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाएं और अपने माता-पिता की जीते-जी सेवा एवं सम्मान करें। यही सच्ची श्रद्धांजलि और सच्चा श्राद्ध है।

