सहजयोग में ध्यान, धारणा और समाधि का आध्यात्मिक महत्व
सहजयोग आत्मसाक्षात्कार के पश्चात आरम्भ होने वाली एक सहज, जीवंत और अनुभव-आधारित आध्यात्मिक साधना है, जिसका उद्देश्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप अर्थात् आत्मा से परिचित कराना है। सहजयोग के अनुसार आध्यात्मिक यात्रा का प्रारम्भ ध्यान (ध्यानावस्था) से होता है। ध्यान वह अवस्था है जिसमें साधक अपनी चेतना को बाह्य विषयों से हटाकर अपने भीतर स्थित आत्मा और सर्वव्यापी परम चैतन्य पर केंद्रित करता है। यह यात्रा पूर्णतः व्यक्तिगत और आंतरिक होती है। इस मार्ग पर प्रत्येक साधक को स्वयं अपने भीतर उतरना पड़ता है, क्योंकि आत्मानुभूति किसी दूसरे के माध्यम से प्राप्त नहीं की जा सकती। जब साधक नियमित रूप से ध्यान करता है और उसकी जागरूकता निर्विचार अवस्था में स्थिर होने लगती है, तब उसके भीतर गहन शांति, संतुलन और आत्मविश्वास का विकास होता है।
ध्यान के निरंतर अभ्यास से साधक का चित्त अधिक स्थिर और एकाग्र होकर धारणा की अवस्था में प्रवेश करता है। धारणा वह स्थिति है जिसमें मन बार-बार भटकने के स्थान पर सहज रूप से आत्मा और परमात्मा पर स्थित रहता है। इस अवस्था में साधक का सूक्ष्म तंत्र अधिक संतुलित होने लगता है तथा उसके विचार, वाणी और कर्म में पवित्रता एवं विवेक का समावेश होने लगता है। धीरे-धीरे उसका दृष्टिकोण सीमित स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक मानवता और समष्टि कल्याण की ओर अग्रसर होता है।
जब यह एकाग्रता पूर्ण परिपक्वता प्राप्त कर लेती है, तब साधक समाधि की अवस्था का अनुभव करता है। समाधि केवल गहन ध्यान की अवस्था नहीं, बल्कि परम चेतना के साथ एकात्म होने का जीवंत अनुभव है। इस अवस्था में साधक निर्विचार जागरूकता में स्थित रहता है और उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रत्येक विचार, निर्णय और कर्म में दिव्य शक्ति का मार्गदर्शन विद्यमान है। उसका अहंकार और आसक्ति क्षीण होने लगते हैं तथा प्रेम, करुणा, क्षमा, विनम्रता और आनंद जैसे दिव्य गुण स्वाभाविक रूप से प्रकट होने लगते हैं।
सहजयोग यह भी सिखाता है कि ध्यान की गहराई ही आध्यात्मिक अनुभवों की गहराई निर्धारित करती है। जिस प्रकार गहरे पात्र में अधिक जल समा सकता है, उसी प्रकार जो साधक नियमित, ईमानदारी और समर्पण के साथ ध्यान करता है, उसकी चेतना उतनी ही अधिक विस्तृत और निर्मल होती जाती है। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात जागृत कुण्डलिनी शक्ति साधक के सूक्ष्म तंत्र का पोषण करती है और उसे निर्विचार जागरूकता में स्थापित करती है। परिणामस्वरूप वह सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मानने लगता है और प्रत्येक जीव में परमात्मा का प्रतिबिंब देखने लगता है। इस प्रकार ध्यान, धारणा और समाधि सहजयोग के तीन क्रमिक आयाम हैं, जो साधक को आत्मज्ञान, आंतरिक शांति, दिव्य आनंद और परमात्मा के साथ एकत्व की सर्वोच्च अनुभूति तक पहुँचाते हैं।
अपने नजदीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं। सहजयोग सदैव निःशुल्क है।

