कॉर्पोरेट बॉन्ड का भविष्य: सेबी का 'टोकनाइजेशन' प्रोजेक्ट और वित्तीय बाजारों में बदलाव"

  • Share on :

सेबी (SEBI) ने कॉर्पोरेट बॉन्ड के टोकनाइजेशन (Tokenisation) के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट आधिकारिक तौर पर शुरू कर दिया है। मुंबई में 'केयरएज डेट मार्केट समिट' में इसकी घोषणा करते हुए सेबी अध्यक्ष तुहिन कांत पांडे ने बताया कि यह प्रोजेक्ट डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (DLT/ब्लॉकचेन) पर आधारित है।

सेबी (SEBI) के इस पायलट प्रोजेक्ट में कॉर्पोरेट बॉन्ड का टोकनाइजेशन (Tokenisation) एक बेहद सुरक्षित और चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा। टोकनाइजेशन का आसान मतलब है: किसी असली वित्तीय संपत्ति (जैसे पेपर बॉन्ड) को डिजिटल 'टोकन' में बदलना, जो ब्लॉकचेन नेटवर्क पर सुरक्षित रहता है।

एक प्रकार की ब्लॉकचेन तकनीक, जहां सारा रिकॉर्ड एक जगह रहने के बजाय नेटवर्क के सभी अधिकृत कंप्यूटरों पर एक साथ सुरक्षित रहता है।

DvP (Delivery versus Payment): यह एक सुरक्षा नियम है, जिसका मतलब है कि जब तक खरीदार के खाते से पैसा ट्रांसफर नहीं होगा, तब तक विक्रेता का टोकन उसके पास नहीं जाएगा। दोनों काम एक ही सेकंड में साथ होंगे।
KYC/AML अनुपालन: इसमें निवेश करने वाले हर व्यक्ति को कड़े नो-योर-कस्टमर (KYC) नियमों और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग नियमों का पालन करना होगा, 

टोकनाइजेशन की पूरी प्रक्रिया

सेबी इस प्रोजेक्ट को मुख्य रूप से चार चरणों में पूरा करेगा:

एसेट लॉकिंग (Asset Locking): सबसे पहले, जिस कॉर्पोरेट बॉन्ड का टोकन बनाना है, उसे एक सुरक्षित और सेबी-रजिस्टर्ड कस्टोडियन या बैंक के पास जमा (Lock) किया जाएगा।

टोकन जारी करना

 (Minting): इसके बाद, परमिशन-आधारित डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (Permissioned DLT) नेटवर्क पर उस बॉन्ड के बदले डिजिटल टोकन जनरेट किए जाएंगे। हर टोकन बॉन्ड के एक निश्चित हिस्से (Fraction) को दर्शाएगा।

स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स (Smart Contracts): टोकन के अंदर कंप्यूटर कोडिंग (Smart Contracts) के जरिए नियम फीड किए जाएंगे। इससे ब्याज (Interest/Coupon) का भुगतान और बॉन्ड की मैच्योरिटी का पैसा बिना किसी इंसानी दखल के निवेशकों को अपने आप ट्रांसफर हो जाएगा।

ट्रेडिंग और सेटलमेंट (Trading & Settlement): निवेशक इन टोकन्स को सेबी द्वारा अधिकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खरीद और बेच सकेंगे।

 इस प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएं और ढांचा (Key Features)
इस नए सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए इसमें कई विशेष नियम और तकनीकें जोड़ी गई हैं:

प्राइवेट ब्लॉकचेन
Permissioned DLT): यह बिटकॉइन जैसे पब्लिक नेटवर्क पर काम नहीं करेगा। इस नेटवर्क को सिर्फ सेबी, रिजर्व बैंक (RBI) और चुनिंदा वित्तीय संस्थान ही नियंत्रित करेंगे, जिससे डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
तुरंत और ऑटोमैटिक सेटलमेंट (T+0 / Instant Settlement): मौजूदा व्यवस्था में बॉन्ड खरीदने या बेचने के बाद पैसे और एसेट ट्रांसफर होने में समय लगता है। टोकनाइजेशन से इंस्टेंट पेमेंट और डिलीवरी संभव होगी।

फ्रेक्शनल ओनरशिप (Fractional Ownership):

 वर्तमान में कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश करने के लिए बड़ी रकम की जरूरत होती है। टोकनाइजेशन के जरिए एक बड़े बॉन्ड को छोटे-छोटे हिस्सों (टोकन्स) में तोड़ा जा सकेगा, जिससे छोटे और आम निवेशक (Retail Investors) भी कम पैसों में सुरक्षित बॉन्ड खरीद पाएंगे।

नियामक तालमेल (Regulatory Oversight): 

सेबी इस प्रोजेक्ट में आरबीआई (RBI) के साथ मिलकर काम कर रहा है। जहां सेबी बॉन्ड और टोकन ट्रेडिंग के नियम देख रहा है, वहीं आरबीआई डिजिटल पेमेंट और कैश सेटलमेंट के नियमों को संभाल रहा है।

जोखिम प्रबंधन (Risk Evaluation):
 
सेबी के अनुसार, इस पूरे 6 से 9 महीने के पायलट प्रोजेक्ट के दौरान तकनीक की सुरक्षा और क्वांटम रिस्क (Quantum Risks) का बारीकी से टेस्ट किया जाएगा, ताकि भविष्य में हैकिंग या तकनीकी गड़बड़ी की कोई गुंजाइश न रहे।

लेखक:
नरेंद्र के यादव
अधिवक्ता, उच्च न्यायालय(इंदौर)
एवं विधिक विशेषज्ञ (फिनटेक, ब्लॉकचेन एवं साइबर कानून)

Latest News

Everyday news at your fingertips Try Ranjeet Times E-Paper