सिंहासा में शासकीय तालाब पर कब्जे का खेल, जिम्मेदारों की चुप्पी से जल संकट की ओर बढ़ता गांव
आदित्य शर्मा
इंदौर। ग्राम सिंहासा में शासकीय तालाब भूमि पर हो रहे अतिक्रमण ने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खसरा क्रमांक 136, जो राजस्व रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से शासकीय तालाब भूमि के रूप में दर्ज है, आज धीरे-धीरे अवैध कब्जों की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में न पंचायत स्तर पर कोई गंभीरता दिखाई दे रही है और न ही प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कार्रवाई की जा रही है।
एक समय जिस तालाब से गांव के जल स्तर को सहारा मिलता था, वही तालाब आज उपेक्षा और अवैध कब्जों के कारण अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच चुका है। क्षेत्र में पहले से पानी की कमी बनी हुई है, गर्मियों में लोगों को पानी के लिए परेशान होना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद तालाब संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी और पंचायत प्रतिनिधि मौन बैठे हुए हैं।
सरकार करोड़ों रुपए जल संरक्षण योजनाओं, अमृत सरोवर अभियान और तालाब पुनर्जीवन के नाम पर खर्च कर रही है, लेकिन जमीन पर स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। सिंहासा में शासकीय तालाब की भूमि पर लगातार कब्जे बढ़ते जा रहे हैं और जिम्मेदार विभाग केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नजर आ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जब राजस्व रिकॉर्ड में भूमि स्पष्ट रूप से तालाब के नाम दर्ज है, तो आखिर अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं होता, बल्कि पूरे पर्यावरण और भूजल स्तर का आधार होता है। तालाबों के समाप्त होने से वर्षा जल संग्रहण प्रभावित होता है, भूजल स्तर लगातार नीचे जाता है और आने वाले समय में जल संकट विकराल रूप ले लेता है। सिंहासा में भी यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। यदि समय रहते तालाब को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया गया तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र गंभीर जल संकट की चपेट में आ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल पंचायत व्यवस्था पर भी खड़ा हो रहा है। गांव की सार्वजनिक और शासकीय संपत्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पंचायत और प्रशासन दोनों की होती है, लेकिन यहां सरपंच-सचिव की निष्क्रियता खुलकर सामने आ रही है। गांव में तालाब की जमीन सिकुड़ती जा रही है, लेकिन जिम्मेदारों द्वारा न सीमांकन कराया जा रहा है और न ही किसी प्रकार की कठोर कार्रवाई दिखाई दे रही है।
लोगों में यह चर्चा भी तेज हो रही है कि आखिर किसके संरक्षण में शासकीय तालाब भूमि पर कब्जे का यह खेल चल रहा है। यदि प्रशासन चाहे तो राजस्व विभाग, पंचायत विभाग और संबंधित अधिकारियों की संयुक्त कार्रवाई से कुछ ही दिनों में तालाब भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जा सकता है, लेकिन अब तक केवल चुप्पी ही दिखाई दे रही है।
जानकारों का मानना है कि यदि गांवों के तालाब इसी तरह खत्म होते रहे तो भविष्य में जल संरक्षण के सारे दावे खोखले साबित होंगे। एक ओर सरकार जल बचाने के संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शासकीय जल स्रोतों को बचाने में जिम्मेदार विभाग पूरी तरह विफल नजर आ रहे हैं।
अब मांग उठ रही है कि खसरा क्रमांक 136 का तत्काल सीमांकन कराया जाए और मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के अंतर्गत सख्त कार्रवाई करते हुए शासकीय तालाब भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए। साथ ही तालाब को उसके मूल स्वरूप में बहाल कर जल संरक्षण के लिए स्थायी कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में सिंहासा को भीषण जल संकट से बचाया जा सके।

