होलिका दहन से शुरू होती है पर्वों की पावन यात्रा
संपादकीय – रणजीत टाइम्स
होली का पर्व केवल रंगों और उमंगों का त्योहार ही नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में एक नए उत्साह और आध्यात्मिक शुरुआत का संकेत भी है। होलिका दहन के समय जब हम विधि-विधान से पूजा अर्चना कर अपने घर लौटते हैं, तभी से हमारे मन और घर-आंगन में आने वाले पावन पर्वों की तैयारी शुरू हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे वातावरण में धीरे-धीरे माता का आगमन हो रहा हो और श्रद्धा का संचार होने लगे।
होलिका दहन के बाद घरों में शीतला सप्तमी का पर्व आता है, जिसमें माता शीतला की पूजा कर परिवार के सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना की जाती है। इसके बाद दशा माता का पूजन होता है, जो गृहस्थ जीवन में संतुलन, सुख और मंगल का प्रतीक माना जाता है। इन पर्वों के माध्यम से परिवार और समाज में आस्था और परंपरा की डोर और अधिक मजबूत होती है।
इसी क्रम में आगे चलकर चैत्र मास का आगमन होता है और नवसंवत्सर के साथ गुड़ी पड़वा तथा चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व शुरू होता है। नवरात्रि के साथ ही मां जगजननी की आराधना प्रारंभ होती है और ऐसा प्रतीत होता है जैसे धीरे-धीरे माता अपने भक्तों के हृदय और घर-आंगन में विराजमान हो रही हों। यह समय भक्ति, साधना और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।
भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि यहां हर त्योहार केवल एक दिन का उत्सव नहीं होता, बल्कि वह आने वाले कई शुभ अवसरों की श्रृंखला लेकर आता है। होलिका दहन से शुरू होकर शीतला सप्तमी, दशा माता और फिर नवरात्रि तक चलने वाली यह आध्यात्मिक यात्रा हमारे जीवन में नई ऊर्जा, आस्था और संस्कारों का संचार करती है।
इन सभी पर्वों का संदेश यही है कि हम अपने जीवन में अच्छाई, श्रद्धा और सकारात्मकता को स्थान दें और परिवार तथा समाज के साथ मिलकर इन परंपराओं को आगे बढ़ाते रहें। यही हमारी सनातन संस्कृति की पहचान और शक्ति है।

