आत्म प्रकाशन से जुड़ा है पुरुषोत्तम मास का दीपदान
पुरुषोत्तम मास याने विक्रम संवत काल गणना पद्धति में ऐसा माह जिसमें नक्षत्र और राशि परिवर्तित नहीं होते अर्थात सूर्य एक ही राशि पर स्थिर हो जाता है । सूर्य एवं चंद्रमा की गति के आधार पर प्रत्येक तीन वर्ष के बाद एक माह ऐसा आता है जिसे अधिक मास कहा जाता है ।
इस काल में सभी मांगलिक कार्य निषिद्ध हैं परंतु यह जप तप स्वाध्याय एवं दान पुण्य के सञ्चय का अप्रतिम संयोग ले कर आता है । यह काल आत्म चिंतन, आत्म दर्शन एवं आत्म शुद्धि का काल है। पद्म पुराण में कहा गया है कि
पुरुषोत्तमम् मासे तु यत्कृते पुण्यकर्मणा ।
तत्सर्वमक्षयम ज्ञेयम् विष्णुलोक प्रदायकम ॥
विष्णुलोक लोक की प्राप्ति कराने वाला पुरुषोत्तम मास आखिर किस ओर संकेत कर रहा है इसे विस्तार से समझते हैं। इस एक माह के काल खण्ड में दीप दान का अप्रतिम महत्व है। दीपन करना, प्रकाश करना या ज्योति प्रज्ज्वलित करना यह पुण्य कार्य देवत्व का प्रतीक है क्योंकि देवता वे हैं जो स्वयम् प्रकाशित होते हैं एवं अन्य को प्रकाशित करते हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रत्यक्ष को प्रमाण माना गया एवं अनुभव को प्रत्यक्ष ज्ञान माना गया क्योंकि वह मानव की ज्ञान इन्द्रियों पर अनुभूत होता है । दर्शन की भारतीय परंपरा में आत्मा के बोध का उल्लेख है अर्थात आत्मा का अनुभव होना ईश्वर से प्रत्यक्ष साक्षात्कार से जुड़ा है ।
स्वाध्याय का यही महत्व है कि अध्ययन से आत्म जागरण की कला को जाना जाए। दान का महत्व भी यहीं से जुड़ा है कि धन के तीन उपयोगों दान भोग एवं नाश में दान विरक्ति से ही उपजता है । जो आत्म बोध की अनिवार्य शर्त है। जप एवं तप तो आत्म ज्ञान के उद्देश्य के प्रबल कारक हैं हीं। तो कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि आत्मा के जागरण एवं श्री विष्णुदेव के सत्वगुणी मार्ग के अवलम्बन का यही काल है। इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी के त्रिसंग में भी इड़ा तमो गुणी प्रवृत्ति का द्योतक है और पिंगला रजो गुण को संजोती है जबकि मध्य नाड़ी विष्णु ग्रंथि विभेदिनी शक्ति के साथ सत्व गुणों के दीपन की कारक है। इसलिए दीप प्रज्ज्वलित करने से तात्पर्य सत्वगुणी हो कर आत्मा का दीपक जला कर स्वयं के आत्म प्रकाशन से है। आत्म प्रकाशित व्यक्ति को ही अधिकार है कि वह अन्य को आत्मबोध की अनुभूति करा सके । भारतीय योग दर्शन में ध्यान धारणा का महत्व यम नियम से अग्रिम सोपान में जुड़ता है जो संकेत देता है कि कारक एवं निषिद्ध कर्मों का बंधन एक सीढ़ी मात्र है वास्तविक लक्ष्य तो आत्म जागरण है । त्रिदेवों के कार्यों में श्रीब्रह्मा सृजन के श्रीविष्णु पालन के एवं श्री शिव पुनर्सृजन हेतु विनाश के देव कहे गए हैं इस दृष्टि से अन्नदान , जलदान एवं वस्त्र दान भी नाभि से जुड़ा है जो विग्रह का द्योतक है । औषधि दान जीव जंतु पर करुणा एवं वृक्षारोपण भी पोषण कार्य से जुड़ा होने के कारण श्री विष्णु को प्रिय है। नाभि की संतुष्टि से ही उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है । अतः दान के पश्चात दीपन का महत्व है आत्मप्रकाश भारत के दर्शन में परम लक्ष्य कहा गया इसे ही मुक्ति का मार्ग अर्थात मोक्ष कहा गया ।
सहजयोग की आत्मसाक्षात्कार पद्धति श्री माता जी निर्मला देवी प्रणित एक ऐसी खोज है जो कलयुग में अर्थाभाव समयाभाव एवं परिश्रम साध्य होने के तीनो अवगुणों के ऊपर है । यह निशुल्क है , तत्क्षण आत्म दर्शन की नवीन पद्धति है जो समय बचाती है और स्वयं को जानने की उत्सुकता बढ़ाती है। मात्र कुछ ही मिनिट प्रतिदिन अभ्यास से यह बीज के अंकुरण की भाँति कोंपल कोंपल बढ़ने लगती है। सरल एवं सहज होने के कारण बच्चे बूढ़े महिला पुरुष शिक्षित अर्ध शिक्षित अशिक्षित सभी इसे अपना सकते हैं। मानव जाति के उत्थान के लिए की गई इस खोज को अनुभव ज्ञान से सीख कर अन्य को भी सिखाया जा सकता है। पुरुषोत्तम काल में स्वयं को पुरुषोत्तम गढ़ने महा मानव बनाने का समय है । स्वयं जागें एवं अन्य को जगाएँ आत्म जागरण ही पुरुषोत्तम मास का पुण्य उद्देश्य होना चाहिए । सहजयोग पूर्णतः निशुल्क है। सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी प्राप्त करने हेतु टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 पर संपर्क करें।

