भरोसे की कीमत
कुछ लोग सपनों के पीछे दौड़ते रहे,
कुछ लोग उन सपनों के साथ जुड़ते रहे।
जिनकी अपनी कोई मंज़िल न थी,
वे हमारे कारवाँ का हिस्सा बनते गए।
हमने उन्हें अपना समझा,
वे हमारी हर जीत के गवाह बनते गए।
कंधे से कंधा मिलाकर चले,
रोटी भी बाँटी, रास्ते भी।
हमने भरोसा दिया,
उन्होंने मुस्कान में राज़ छिपाए।
लेकिन एक दिन सच सामने आया...
कारवाँ बाहर वालों से नहीं हारा,
हार तो अपनों के हाथों लिखी गई।
घर का भेदी लंका ढाए,
यह कहावत फिर सच हो गई।
जिस हाथ को थामकर आगे बढ़े,
उसी हाथ ने पीठ पर वार किया।
जिसे अपना समझा,
उसी ने सफ़र को बिखेर दिया।
तब समझ आया—
हर साथ चलने वाला हमसफ़र नहीं होता,
हर मुस्कुराता चेहरा वफ़ादार नहीं होता।
सफलता का सबसे बड़ा इम्तिहान
मंज़िल तक पहुँचना नहीं,
बल्कि मंज़िल तक पहुँचते हुए
सही लोगों को पहचानना है।
भरोसा कीजिए...
मगर आँखें बंद करके नहीं।
क्योंकि कई बार
दुश्मन सामने नहीं होता,
वह आपके साथ ही चल रहा होता है।
फिर भी सफ़र मत रोकिए,
क्योंकि विश्वास टूट सकता है,
लेकिन हौसला नहीं।
कारवाँ फिर बनेगा,
मंज़िल फिर मिलेगी,
और इतिहास गवाह रहेगा—
विश्वासघात से इंसान रुकता नहीं,
और मज़बूत होकर आगे बढ़ता है।

कवि: गोपाल गावंडे

