ध्यान और दिव्य ऊर्जा का संबंध (सहजयोग के संदर्भ में)

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ध्यान मानव जीवन को संतुलित और शांत बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है। सहजयोग के अनुसार, ध्यान केवल मानसिक अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण की प्रक्रिया है। यह हमें हमारी आंतरिक दिव्य ऊर्जा से सीधे जोड़ता है।
सहजयोग की स्थापना श्री माताजी निर्मला देवी जी द्वारा की गई, जिन्होंने बताया कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक सूक्ष्म ऊर्जा विद्यमान होती है, जिसे कुंडलिनी शक्ति कहा जाता है। यह शक्ति हमारे शरीर में स्थित चक्रों के माध्यम से ऊपर उठती है और सहस्रार चक्र को स्पर्श करके हमें दिव्य ऊर्जा से जोड़ती है।
जब व्यक्ति सहजयोग के माध्यम से ध्यान करता है, तो यह प्रक्रिया स्वाभाविक (सहज) रूप से घटित होती है। कुंडलिनी के जागरण के बाद व्यक्ति अपने भीतर शांति, आनंद और ठंडी कंपन (वाइब्रेशन) का अनुभव करता है। यही कंपन दिव्य ऊर्जा का प्रत्यक्ष अनुभव माने जाते हैं।
सहजयोग यह सिखाता है कि दिव्य ऊर्जा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही विद्यमान है। ध्यान के द्वारा जब हमारा मन विचारहीन (thoughtless awareness) अवस्था में पहुंचता है, तब हम इस ऊर्जा को स्पष्ट रूप से महसूस कर पाते हैं। यह अनुभव न केवल आध्यात्मिक उन्नति करता है, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी संतुलन, नैतिकता और सकारात्मकता लाता है।
अतः सहजयोग के दृष्टिकोण से ध्यान और दिव्य ऊर्जा का संबंध अत्यंत गहरा और प्रत्यक्ष है। ध्यान के माध्यम से मनुष्य अपनी आंतरिक कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर दिव्य चेतना से एकाकार हो सकता है और अपने जीवन को अधिक शांत, संतुलित और आनंदमय बना सकता है।
विस्तार से सहज योग को जानने और आत्मसाक्षात्कार  को प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से प्राप्त कर सकते हैं।  सहज योग सदैव नि:शुल्क है।

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