मानव का सूक्ष्म तंत्र और सहजयोग
हम क्या हैं? हमारे भीतर परमात्मा ने कौन-कौन सी सूक्ष्म व्यवस्थाएँ स्थापित की हैं, और किस तंत्र के माध्यम से हम परमात्मा की प्राप्ति कर सकते हैं—इसी का ज्ञान सहजयोग प्रदान करता है। परमात्मा ने मनुष्य के भीतर पूर्ण तैयारी पहले से ही कर रखी है; आवश्यकता केवल उस दिव्य शक्ति को जागृत करने की है। जब मनुष्य आत्मसाक्षात्कार (आलोकित अवस्था) प्राप्त कर लेता है, तब यह समस्त ज्ञान सहज रूप से अनुभव में आने लगता है।
हमारे शरीर में स्वचालित नाड़ीतंत्र (Autonomic Nervous System) कार्य करता है, जिसके तीन प्रमुख सूक्ष्म मार्ग हैं—ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी। ईड़ा नाड़ी (बायाँ मार्ग) बाएँ अनुकम्पी नाड़ीतंत्र का पोषण करती है। इसे चन्द्र नाड़ी भी कहा जाता है और यह हमारे भावनात्मक पक्ष, भूतकाल तथा अवचेतन मन से संबंधित है। पिंगला नाड़ी (दायाँ मार्ग) दाएँ अनुकम्पी नाड़ीतंत्र के लिए कार्य करती है। इसे सूर्य नाड़ी कहा जाता है तथा यह हमारी बुद्धि, कर्मशीलता, भविष्य और अतिचेतन मन का संचालन करती है। इन दोनों के मध्य स्थित सुषुम्ना नाड़ी वह दिव्य मार्ग है जिससे होकर कुण्डलिनी ऊपर उठती है, ब्रह्मरन्ध्र का भेदन करती है और साधक का सर्वव्यापक परमचैतन्य से योग स्थापित होता है। बायाँ और दायाँ अनुकम्पी नाड़ीतंत्र परस्पर पूरक होते हुए भी विपरीत दिशाओं में कार्य करते हैं।
सुषुम्ना मार्ग पर सात प्रमुख सूक्ष्म ऊर्जा चक्र स्थित हैं, जिनका निर्माण मानव की आध्यात्मिक उत्क्रान्ति के साथ हुआ है। ये हैं—मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, नाभि चक्र , अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र तथा सहस्रार चक्र। इन चक्रों के अतिरिक्त कुछ सहायक चक्र भी होते हैं, जो हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कुण्डलिनी मनुष्य के भीतर स्थित शुद्ध इच्छा-शक्ति है, जिसका उद्देश्य हमें सर्वव्यापक परमचैतन्य से जोड़ना है। यह शक्ति पवित्र त्रिकोणाकार अस्थि सेक्रम बोन में साढ़े तीन कुण्डलों के रूप में विराजमान रहती है। "Sacrum" शब्द का अर्थ ही "पवित्र अस्थि" है, जो इस शक्ति की दिव्यता को दर्शाता है। सहजयोग में आत्मसाक्षात्कार के समय यही कुण्डलिनी जागृत होकर सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठती है और सहस्रार चक्र का भेदन कर साधक को परमात्मा के सर्वव्यापक प्रेम एवं चैतन्य से जोड़ देती है।
सहजयोग के अनुसार हमारे हृदय में आत्मा का निवास है, जो स्वचालित नाड़ीतंत्र का संचालन करती है। यह आत्मा सर्वशक्तिमान परमात्मा का प्रतिबिम्ब है, जबकि कुण्डलिनी परमात्मा की आदिशक्ति का प्रतिबिम्ब है। जब आत्मा का प्रकाश और कुण्डलिनी की जागृति एक साथ अनुभव में आती है, तभी मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जान पाता है और आध्यात्मिक उत्क्रान्ति का अंतिम चरण पूर्ण होता है।
सहज योग से संबंधित अधिक जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

