मेरे मरने के बाद की दुनिया
बच्चे बड़े हो गए,
अपनी-अपनी दुनिया में खो गए,
जिनकी छोटी-सी उँगली पकड़कर
मैंने चलना सिखाया था,
आज उन्हीं के घर की एक दीवार पर
मेरी तस्वीर धूल खाती रह गई।
फिर किसी ने एक दिन कह दिया—
“गुज़र चुके लोगों की तस्वीर
घर में नहीं लगानी चाहिए,
अशुभ होता है…”
और मेरी तस्वीर उतार दी गई।
उस दिन शायद
मेरी तस्वीर दीवार से नहीं उतरी थी,
मैं उस घर से दूसरी बार निकाला गया था।
जिस घर की एक-एक ईंट के लिए
मैंने अपना पसीना बहाया,
जिस परिवार की खुशियों के लिए
अपनी कितनी इच्छाएँ दबाईं,
जिसके बच्चों की फीस भरने के लिए
मैंने अपने शौक छोड़ दिए,
जिसकी छत बचाने के लिए
मैं खुद धूप में जलता रहा—
आज उसी घर के लिए
मैं अशुभ हो गया था।
जीते-जी मैं सोचता था—
“मेरे बिना इनका क्या होगा?”
रात को नींद नहीं आती थी,
बच्चों का भविष्य सोचता था,
परिवार की चिंता करता था,
कल पैसा कहाँ से आएगा,
बच्चे कैसे आगे बढ़ेंगे,
घर कैसे चलेगा…
मैं हर किसी के कल के लिए जीता रहा,
बस अपना आज जीना भूल गया।
और आज…
मेरे बिना भी सुबह होती है,
चाय बनती है,
दरवाज़े खुलते हैं,
त्योहार आते हैं,
हँसी गूँजती है,
शादियाँ होती हैं,
बच्चे घूमने जाते हैं,
तस्वीरें खिंचती हैं…
दुनिया बिल्कुल वैसी ही चल रही है।
मैं ही बेवजह डरता रहा—
“मेरे बाद क्या होगा?”
कुछ नहीं हुआ।
बस एक आदमी कम हो गया,
और कुछ दिनों बाद
उसकी कमी की आदत भी पड़ गई।
अब साल में शायद
मेरी पुण्यतिथि पर
मोबाइल की गैलरी से मेरी कोई पुरानी तस्वीर निकलेगी।
फेसबुक पर लिखा जाएगा—
“भावपूर्ण श्रद्धांजलि…
आप हमेशा हमारी यादों में रहेंगे।”
कुछ लोग हाथ जोड़ने वाला निशान भेजेंगे,
कुछ लिखेंगे—
“शत्-शत् नमन।”
और अगले दिन
नई पोस्ट के नीचे
मेरी तस्वीर कहीं पीछे छूट जाएगी।
तब मुझे समझ आया—
जिस परिवार के लिए
मैंने पूरी जिंदगी खर्च कर दी,
वह परिवार मेरे बिना भी जीना सीख गया।
गलती उनकी नहीं थी,
यही शायद दुनिया का नियम है।
लोग चले जाते हैं,
पीछे रहने वाले जीना सीख जाते हैं।
लेकिन एक सवाल
मेरी आत्मा से बार-बार पूछता है—
जब सबको मेरे बिना जीना ही था,
तो मैंने अपने साथ जीना क्यों नहीं सीखा?
क्यों हर इच्छा को यह कहकर टाल दिया—
“अभी बच्चे छोटे हैं…”
क्यों हर सपना यह कहकर छोड़ दिया—
“पहले परिवार संभल जाए…”
क्यों हर यात्रा टाल दी,
हर खुशी बचाकर रखी,
हर शौक मार दिया
और हर बार जिंदगी से कहा—
“अभी नहीं… बाद में।”
आज समझ आया…
वह “बाद में” कभी आया ही नहीं।
जिंदगी जिम्मेदारियाँ पूरी करते-करते
चुपचाप पूरी हो गई।
अब भगवान के सामने खड़ा हूँ
तो धन नहीं माँगता,
बड़ा घर नहीं माँगता,
नाम नहीं माँगता,
लंबी उम्र भी नहीं माँगता।
बस एक छोटी-सी विनती है—
हे भगवान,
अगर दूसरा जन्म देना,
तो मुझे फिर वही अपने देना,
वही बच्चे देना,
वही परिवार देना…
लेकिन इस बार
मुझे थोड़ा-सा “मैं” भी देना।
इस बार मैं उनके लिए भी जिऊँगा,
मगर अपने लिए भी जिऊँगा।
बच्चों का भविष्य बनाऊँगा,
मगर अपना वर्तमान नहीं मिटाऊँगा।
जिम्मेदारियाँ निभाऊँगा,
मगर जिंदगी को
जिम्मेदारियों की सज़ा नहीं बनने दूँगा।
क्योंकि अब समझ आया है—
मेरे मरने से दुनिया नहीं रुकेगी,
लेकिन मेरे जीते-जी
अगर मैं खुद के लिए नहीं जिया,
तो मेरी अपनी दुनिया
एक दिन जरूर अधूरी रह जाएगी।
और शायद इंसान की सबसे बड़ी भूल यही है—
वह सारी उम्र यह सोचता रहता है
कि “मेरे बिना अपनों का क्या होगा?”
मगर कभी यह नहीं सोचता—
“अपनों के लिए जीते-जीते
मेरे अंदर जो ‘मैं’ मर रहा है,
उसका क्या होगा?”

— गोपाल गावंडे की कलम से

