सहज योग ध्यान से हम स्वयं के बंधन से भी मुक्त होते हैं

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स्वंय के बंधन से मुक्त होने का अर्थ है अपनी आत्मा को हर बोझ से मुक्त करके आत्म स्वछंदता प्राप्त करना।   आत्म स्वछंदता का अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि हम अपनी जिम्मेदारियों से  विमुख होकर जीवन बिताने की कल्पना करें।  आत्मा पर हमारे नकारात्मक विचार (क्रोध, जलन, अभिमान  आदि), गलत आदतें ( आलस्य, चिड़चिड़ापन  आदि) और कर्म बंधन का गहरा असर रहता है।  कर्म करते समय भी हममें कर्ता भाव ना हो तो हम उस कार्य को भी बहुत आनंद के साथ करेंगे और आनंदित होकर कार्य करते ही आत्मा शांत, स्थिर हो जाती है।  यही भाव स्वयं से मुक्त होने का भाव है। जीवन में शांति रहे इसके लिए इस भाव को समझने का प्रयास करना एक सही कदम होगा। 
अपने नकारात्मक विचारों को पहचानना और उन्हें सकारात्मक सोच से बदलना यदि आसान नहीं है तो असंभव भी नहीं है।  परंतु आत्म संतुलन के लिए हमें स्वयं को पहचानना होगा तभी हम अवगुणों को स्वयं से दूर कर पायेंगे।अपने आंतरिक स्थिति को समझने के लिए हमें ध्यान‌ में गहनता पाने की आवश्यकता है , जो  स्वयं की समस्याओं का हल खोजने में मदद करती है।‌  हमारी अशुद्ध इच्छायें और अंहकार भाव ही हमारे आत्मोत्थान में सबसे बड़ी बाधा है। 
सहज योग में आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करते ही साधक की सुप्त कुंडलिनी ऊर्जा शक्ति जागृत होती है और सात चक्रों और तीन नाड़ियों को प्रकाशित कर देती है। चक्रों और नाड़ियों पर नियमित ध्यान केंद्रित करने से चक्रों के गुण  हमारे अंदर स्थापित  होते हैं और साधक को मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। यह अभ्यास तनाव, चिंता को कम करता है, एकाग्रता बढ़ाता है, आत्म-जागरूकता में सुधार करता है और आत्म-सुधार के साथ करुणा एवं रचनात्मकता जैसे गुणों को विकसित करता है और हम एक आश्वस्त जीवन जीने लगते हैं।                               स्वंय को बंधनमुक्त करने व‌ आत्मसाक्षात्कार  को प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से प्राप्त कर सकते हैं। सहज योग सदैव नि:शुल्क है।

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