हम जीना भूल गए
ज़िंदगी क्या है…
शायद इसी सवाल का जवाब ढूँढते-ढूँढते
हम पूरी ज़िंदगी गुज़ार देते हैं।
बस चलते जा रहे हैं…
चलते जा रहे हैं…
चलते जा रहे हैं…
न जाने कौन-सी उम्मीद है,
जो हमें रुकने नहीं देती।
न जाने कौन-सी आशा है,
जो हमें थकने नहीं देती।
न जाने कौन-से सपने हैं,
जो हर सुबह हमें फिर दौड़ने के लिए जगा देते हैं।
कभी पैसे के पीछे,
कभी नाम के पीछे,
कभी शोहरत के पीछे,
कभी अपने बच्चों का भविष्य बनाने के पीछे…
हम भागते रहे,
बस भागते रहे।
सोचा—
थोड़ा और कमा लें, फिर आराम करेंगे।
थोड़ा और बड़ा घर बना लें,
फिर परिवार के साथ बैठेंगे।
थोड़ा कारोबार और बढ़ जाए,
फिर पुराने दोस्तों से मिलेंगे।
बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ,
फिर अपने लिए भी जिएँगे।
लेकिन जिंदगी में वह “फिर”
न जाने कब आएगा…
क्योंकि देखते-देखते
हमारे अपने ही हमसे बिछड़ते गए।
कोई परिवार का सदस्य चला गया,
कोई मित्र चला गया,
कोई पड़ोसी चला गया,
तो कोई ऐसा चला गया
जिससे कल ही मिलने का वादा किया था।
जो कल तक हमारे साथ बैठकर हँसते थे,
आज उनकी तस्वीर दीवार पर टंगी है।
जिनसे कहते थे—
“कभी फुर्सत में बैठेंगे…”
आज उन्हीं के लिए कहते हैं—
“काश! थोड़ा वक्त निकाल लिया होता…”
कितना अजीब है ना…
जिंदगी भर हम समय बचाने की कोशिश करते हैं,
लेकिन आखिर में समझ आता है
कि समय कभी बचता ही नहीं,
समय तो बस बीतता है।
हम हिसाब लगाते रहे—
कितना कमाया,
कितना बनाया,
कितना बचाया,
कितनी जमीन हुई,
कितना बड़ा घर हुआ…
लेकिन कभी यह हिसाब नहीं लगाया
कि माँ के पास बैठकर कितनी शामें बिताईं,
पिता की कितनी बातें ध्यान से सुनीं,
बच्चों के साथ कितनी बार खुलकर हँसे,
जीवनसाथी से कितनी बार दिल की बात की,
और पुराने दोस्तों को कितनी बार
बिना किसी काम के फोन लगाया।
हम भविष्य बनाने में इतने व्यस्त हो गए
कि हमारा वर्तमान
चुपचाप हाथों से फिसलता गया।
बच्चे बड़े हो गए,
माँ-बाप बूढ़े हो गए,
दोस्त अपनी-अपनी दुनिया में खो गए,
और आईने में हमारे बाल भी
धीरे-धीरे सफेद हो गए।
फिर एक दिन समझ आया—
जिस जिंदगी को सँवारने के लिए
हम पूरी जिंदगी भागते रहे,
उसी जिंदगी को जीना भूल गए।
एक दिन हमारी दौड़ भी रुक जाएगी।
फोन वहीं रहेगा,
गाड़ी वहीं खड़ी रहेगी,
घर वहीं रहेगा,
कारोबार चलता रहेगा,
बैंक का खाता भी रहेगा,
दुनिया भी वैसे ही चलती रहेगी…
बस हम नहीं होंगे।
फिर कोई हमारी तस्वीर देखकर कहेगा—
“बहुत मेहनत की इन्होंने…”
“बहुत नाम कमाया…”
“बहुत कुछ बनाया…”
पर शायद कोई यह नहीं पूछेगा—
इतना सब बनाते-बनाते
इन्होंने अपनी जिंदगी जी कितनी?
इसलिए…
थोड़ा रुक जाइए।
माँ-बाप के पास बैठ जाइए,
बच्चों को गले लगा लीजिए,
जीवनसाथी के साथ चाय पी लीजिए,
पुराने दोस्त को फोन लगा लीजिए,
किसी रूठे अपने को मना लीजिए।
कभी बिना वजह हँस लीजिए,
कभी बिना मंजिल घूम आइए,
कभी काम छोड़कर परिवार के साथ बैठ जाइए।
क्योंकि जिंदगी लंबी हो,
यह हमारे हाथ में नहीं…
लेकिन जितनी भी हो,
उसे जी भरकर जीना हमारे हाथ में जरूर है।
कल की चिंता में
आज को मत खो दीजिए।
क्योंकि आखिर में
न पैसा साथ जाएगा,
न मकान,
न गाड़ी,
न पद और न प्रतिष्ठा।
साथ रह जाएँगी तो बस
कुछ यादें,
कुछ रिश्ते,
कुछ हँसी के पल
और अपनों के दिलों में छोड़ा हुआ प्यार।
हम जिंदगी बनाने निकले थे,
और जिंदगी कमाने में लग गए।
सब कुछ पाने की चाह में
न जाने कितने अपने पीछे छोड़ गए।
चलते रहे…
चलते रहे…
चलते रहे…
और जब एक दिन पलटकर देखा,
तो बहुत कुछ हमारे पास था…
बस वह समय नहीं था,
जिसमें उसे जी सकें।
तब दिल ने धीरे से कहा—
“तुम जिंदगी से हारे नहीं थे,
तुमने बहुत कुछ पाया था…
बस पाने की इस भाग-दौड़ में,
तुम जीना भूल गए थे।”

— कवि गोपाल गावंडे

