पश्चिम एशिया संकट: भारतीय कूटनीति की बड़ी जीत, होर्मुज स्ट्रेट से बिना शुल्क निकले भारत के व्यापारिक जहाज

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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया संकट के दौरान होर्मुज स्ट्रेट से जितने भी भारतीय व्यापारिक जहाज गुजरे, अगर उनके लिए भारतीय विदेश मंत्रालय ने बातचीत की थी, तो किसी को एक भी पैसे नहीं देने पड़े। यह बात तब सामने आई है, जब ईरान ने एलान कर दिया है कि उसने अब भारतीय जहाजों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से खोल दिया है। भारत के लिए सबसे बड़ी राहत की बात ये है कि होर्मुज में भारतीय जहाजों को लेकर अमेरिका के रुख में भी बड़ा बदलाव आ चुका है।
पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच होर्मेज स्ट्रेट जहाजों की आवाजाही के लिए पूरी तरह से बंद होने से पहले कई अंतरराष्ट्रीय टैंकरों को मोटी रकम देने के बाद वहां से गुजरने की अनुमति दी जा रही थीं। बाद में भी यही स्थिति बनी रही। लेकिन, हमारे सहयोगी अंग्रेजी अखबार ET ने मामले की जानकारी रखने वालों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि जिन जहाजों को भारतीय विदेश मंत्रालय ने ईरान से बातचीत करके इजाजत दिलवाई, उसके लिए भारत सरकार को कोई ट्रांजिट फीस नहीं देने पड़े।
होर्मुज स्ट्रेट लगभग पूरी तरह से बंद होने से पहले मार्च और जून के बीच विशेष तौर पर तेल और गैस टैंकरों को निकालने के लिए भारत और ईरान ने कई दौर की विस्तृत बातचीत की। तब भारत उन कुछ चुनिंदा देशों में शामिल था, जिसके जहाजों को तेहरान ने इस रास्ते गुजरने दिया। उसी दौरान ऐसी बातें आईं कि ईरान ने ओमान के साथ मिलकर इसके लिए टॉल भी वसूलना शुरू किया है। लेकिन, अब यह बात साफ हो चुकी है कि अगर भारत और ईरान ने आधिकारिक स्तर पर किसी टैंकर को लेकर बात की तो उसके लिए भारतीय जहाजों को अठन्नी भी नहीं देनी पड़ी।
दरअसल, जब से ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमले शुरू किए, भारत ने तेहरान के साथ लगातार संवाद कायम रखा है। दोनों देशों के नेताओं की बार-बार बातचीत होती रही है और उसका परिणाम बीच-बीच में भी दिखाई पड़े और अब तो स्थिति और भी स्पष्ट हो चुकी है।
फरवरी में खाड़ी में युद्ध शुरू होने के बाद सबसे पहले ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह 5 मार्च, 2026 को दिल्ली आए और उनकी विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात हुई।
पश्चिम एशिया युद्ध की वजह से भारत पर ऊर्जा संकट गहरा रहा था। फारस की खाड़ी में भारत आ रहे कई तेल और गैस टैंकर लंगर डाले खड़े थे। उसी दौरान 24 मार्च को भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फथाली ने एस जयशंकर से इस संकट पर लंबी चर्चा की।
फिर 14-15 मई, 2026 को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए दिल्ली आए, तब भी एस जयशंकर के साथ द्विपक्षीय चिंताओं पर बात की। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से भी अलग से मुलाकात की।
इस दौरान दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व आपस में फोन के जरिए भी लगातार संपर्क में बने रहे।
सितंबर में ब्रिक्स समिट के लिए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भारत आए तो उन्होंने 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अलग से मुलाकात की।
इससे पहले 31 अगस्त, 2026 को बिश्केक में एससीओ समिट के दौरान भी दोनों नेताओं की आपसी मुलाकात हुई थी।
भारत और ईरान के नेताओं की बातचीत का एजेंडा मूल रूप से पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय शांति, नौवहन और व्यापार की आजादी और समुद्री नाविकों की सुरक्षा पर केंद्रित रहा।
साभार नवभारत टाइम्स 

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