कहाँ है जननायक? कहाँ है जनसेवक?
✍️ गोपाल गांवडे जी की कलम से

संपादक — रणजीत टाइम्स
नेता तो बहुत हैं इस देश में,
पर जननायक कहाँ है?
भाषण तो हर मंच पर गूँज रहे,
पर जनता की सुनने वाला कहाँ है?
जिसे हमने अपना मत देकर
विधानसभा तक पहुँचाया था,
वो हमारा प्रतिनिधि था—
फिर हमसे इतना दूर कैसे हो गया?
जनसेवक का अर्थ कुर्सी नहीं,
जनता की सेवा है।
जननायक का अर्थ चेहरा नहीं,
जनता की आवाज़ बनना है।
अगर भारत की हर विधानसभा में
वहीं की समस्याएँ हल होने लगें,
हर जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र को
अपना परिवार समझने लगे,
तो सोचिए—
देश की कितनी समस्याएँ
अपने आप खत्म हो जाएँगी।
कहीं स्कूल है, पर शिक्षक नहीं,
कहीं अस्पताल है, पर डॉक्टर नहीं,
कहीं सड़क है, पर चलने लायक नहीं,
कहीं डिग्री है, पर रोजगार नहीं,
कहीं हुनर है, पर अवसर नहीं,
और कहीं व्यापारी
व्यवस्था से ही लड़ रहा है।
युवा इंस्टाग्राम की रीलों में व्यस्त है,
बुजुर्ग फेसबुक की दुनिया में,
और जिसे न्याय नहीं मिला—
वो आज भी सड़क पर खड़ा है।
लेकिन जननायक जी,
एक सवाल आपके आसपास भी है—
आपके साथ चलने वाले कौन हैं?
और वे जनता के लिए क्या कर रहे हैं?
जो कल कार्यकर्ता बनकर
जनता की सेवा की बात करते थे,
क्या आज उनमें से कुछ
सिर्फ अपने कारोबार,
जमीन और प्रॉपर्टी के सौदों में
व्यस्त तो नहीं हो गए?
जननायक की छाया में
अगर किसी की अपनी तरक्की होती रहे,
और उसी क्षेत्र की जनता
अपनी परेशानी लेकर भटकती रहे,
तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अगर आपके नाम की आड़ लेकर
कोई लोगों को धमकाता है,
किसी की जमीन पर कब्जे की कोशिश करता है,
दबाव बनाता है,
या अपने प्रभाव का इस्तेमाल
निजी फायदे के लिए करता है—
तो उसे रोकना भी
जननायक का ही कर्तव्य है।
क्योंकि जननायक होना
सिर्फ स्वयं गलत काम न करना नहीं है,
अपने नाम और प्रभाव की आड़ में
गलत काम न होने देना भी है।
आपके साथ तस्वीर खिंचवाने वाला हर व्यक्ति
आपका सच्चा कार्यकर्ता नहीं होता।
सच्चा कार्यकर्ता वह है
जो किसी गरीब की जमीन बचाए,
किसी की जमीन छीने नहीं।
जो कमजोर की आवाज़ बने,
उसे धमकाए नहीं।
जो जनता का काम करवाए,
जननायक के नाम का इस्तेमाल करके
अपना काम न बनाए।
जननायक जी,
अपने आसपास भी देखिए।
कौन आपके नाम से सेवा कर रहा है
और कौन आपके नाम को
अपनी ताकत बना रहा है?
कौन जनता को आपके पास ला रहा है
और कौन आपके नाम से
जनता के रास्ते बंद कर रहा है?
गलत करने वाला जितना जिम्मेदार है,
उसे देखकर भी चुप रहने वाली व्यवस्था से
जनता सवाल जरूर पूछेगी।
इसलिए जननायक का धर्म है—
जनता को गलत लोगों से बचाना,
चाहे वे गलत लोग
उसके कितने ही करीबी क्यों न हों।
कार्यकर्ता की पहचान
उसकी गाड़ी, जमीन, कारोबार
या नेता के साथ लगी तस्वीर से नहीं,
जनता के लिए किए गए काम से होनी चाहिए।
जननायक जी,
आपको जनता ने सिर्फ चुनाव जिताने के लिए नहीं चुना,
अपनी आवाज़ बनाने के लिए चुना है।
किसी माँ को इलाज के लिए भटकना न पड़े,
किसी बच्चे की पढ़ाई गरीबी से न रुके,
किसी युवा को रोजगार के लिए भटकना न पड़े,
किसी व्यापारी को व्यवस्था से डरना न पड़े,
और किसी सामान्य नागरिक को
आपके ही आसपास के प्रभावशाली लोगों से
भयभीत न होना पड़े।
हर विधानसभा सँवर जाए,
तो प्रदेश सँवर जाएगा।
हर प्रदेश सँवर जाए,
तो भारत सँवर जाएगा।
हमें सिर्फ नेता नहीं चाहिए,
हमें जननायक चाहिए।
हमें ऐसा जनसेवक चाहिए
जो चुनाव के समय ही दरवाजे पर न आए,
बल्कि मुसीबत के समय
दरवाजे पर खड़ा मिले।
और ऐसा जननायक चाहिए
जो अपने विरोधियों की गलतियों पर ही नहीं,
अपने लोगों की गलतियों पर भी
उतनी ही मजबूती से खड़ा हो।
क्योंकि जिस दिन
जननायक अपने आसपास के गलत हाथों को रोक देगा,
जनसेवक अपना कर्तव्य निभाएगा,
युवा अपनी शक्ति पहचानेगा
और नागरिक अपनी जिम्मेदारी—
उस दिन विकास पोस्टरों पर नहीं,
हर गली, हर गाँव,
हर विधानसभा और हर घर में दिखाई देगा।
फिर शायद पूछना नहीं पड़ेगा—
“कहाँ है जननायक?
कहाँ है जनसेवक?”
क्योंकि सच्चे जननायक की पहचान
उसके पीछे चलने वाली भीड़ नहीं,
उसके राज में निडर होकर जीती हुई जनता होती है।

