दीपावली की आहट के साथ गूंजने लगे सुआ गीत, गांवों में आज भी जीवंत है छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति

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आधुनिकता की दौड़ में शहरों से सिमटती जा रही पारंपरिक विरासत, ग्रामीण अंचलों में बालिकाएं और महिलाएं संभाल रही सांस्कृतिक परंपरा की कमान

छुरा। दीपावली का पर्व नजदीक आते ही छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक लोकगीतों और लोकनृत्यों की गूंज सुनाई देने लगती है। इन्हीं लोक परंपराओं में सुआ नृत्य का विशेष स्थान है। महिलाओं और युवतियों द्वारा गोल घेरा बनाकर तालियों की थाप पर सुआ गीत गाते हुए किया जाने वाला यह पारंपरिक नृत्य छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन की सुंदर पहचान है। सुआ गीतों की मधुर धुन और नृत्य की लयबद्ध प्रस्तुति देखकर मन आनंदित हो उठता है।

सुआ नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, लोक आस्था, सामाजिक परंपरा और भावनाओं से जुड़ी एक अनमोल विरासत है। इसका संबंध मुख्य रूप से नई फसल के आगमन, धान की कटाई की खुशी और प्रकृति के प्रति आभार से माना जाता है। लोकगीतों में भगवान शिव-पार्वती के गौरा-गौरी विवाह प्रसंग और लोक जीवन से जुड़ी अनेक कथाओं की झलक भी देखने को मिलती है।

सुआ को संदेशवाहक मानकर करती हैं पूजा

इस नृत्य की सबसे खास विशेषता है सुआ अर्थात तोते का प्रतीक। महिलाएं मिट्टी या लकड़ी से बने तोते को धान अथवा अनाज से भरी टोकरी के बीच स्थापित करती हैं। इसके चारों ओर गोल घेरा बनाकर महिलाएं और बालिकाएं सामूहिक रूप से गीत गाती हैं और तालियों की थाप पर नृत्य करती हैं। लोकमान्यता के अनुसार सुआ को संदेशवाहक माना जाता है, जिसके माध्यम से महिलाएं अपने मन की भावनाएं और संदेश अपने प्रिय(देवी-देवताओं)तक पहुंचाने की कल्पना करती हैं। गीतों में प्रेम, विरह, पारिवारिक जीवन, सामाजिक परिस्थितियों और धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति होती है।

शहरों में सिमटती परंपरा, गांवों में अब भी कायम है पहचान

एक समय था जब सुआ नृत्य केवल ग्रामीण अंचलों तक सीमित नहीं था, बल्कि धीरे-धीरे शहरों और सार्वजनिक सांस्कृतिक आयोजनों में भी अपनी पहचान बना रहा था। लेकिन बदलती जीवनशैली, आधुनिक मनोरंजन के साधनों और नई पीढ़ी की बदलती रुचियों के बीच यह परंपरा कई स्थानों पर कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। विकास और आधुनिकता ने जहां जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं कहीं न कहीं हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत पर भी इसका प्रभाव पड़ा है।

छत्तीसगढ़ अपनी विशिष्ट लोककला, लोकगीत, नृत्य, तीज-त्योहार और परंपराओं के लिए देशभर में अलग पहचान रखता है। ऐसे में सुआ नृत्य जैसी सांस्कृतिक धरोहर का धीरे-धीरे सीमित होते जाना चिंता का विषय है। हालांकि छुरा सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बालिकाएं और महिलाएं इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभा रही हैं। दीपावली के पहले गांवों में सुआ गीतों की गूंज इस बात का प्रमाण है कि लोक संस्कृति की जड़ें आज भी ग्रामीण समाज में मजबूत हैं।

नई पीढ़ी तक पहुंचे यह विरासत

लोक संस्कृति किसी भी समाज की पहचान होती है। इसे केवल त्योहारों और आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय नई पीढ़ी को इससे जोड़ना भी जरूरी है। यदि बच्चों और युवाओं को पारंपरिक गीतों, नृत्यों और उनकी सांस्कृतिक महत्ता से परिचित कराया जाए तो आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत को आगे बढ़ा सकेंगी। सुआ नृत्य की थाप केवल एक लोकनृत्य की आवाज नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी, खेती-किसानी, आस्था और सांस्कृतिक पहचान की धड़कन है। जरूरत है कि इस धरोहर को विलुप्त होने से बचाने के लिए समाज मिलकर प्रयास करे।

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