100 साल पुरानी परम्परा आज भी जीवंत — स्वदेशी मिल गणेशोत्सव समिति निकालेगी तीन भव्य झांकियां
गणेश पूजन के साथ किया झांकी निर्माण का श्रीगणेश
इन्दौर । इन्दौर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलों द्वारा शुरू की गई गणेश विसर्जन चल समारोह की गौरवशाली परम्परा को लगभग 100 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। भले ही शहर की कपड़ा मिलें अब बंद हो गई हों, लेकिन मिल मजदूरों और शहरवासियों की आस्था से जुड़ी यह ऐतिहासिक सांस्कृतिक परम्परा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है।
इसी गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाते हुए स्वदेशी मिल गणेश उत्सव समिति अपने गणेशोत्सव के 96 वर्ष पूर्ण कर 97वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। समिति ने अपनी वर्षों पुरानी परम्परा के अनुरूप इस वर्ष तीन भव्य झांकियां निकालने का निर्णय लिया है।
इसी क्रम में गुरुवार को झांकियों के तीन ट्रालों का विधिवत पूजन किया गया। गणेश पूजन एवं झांकी पूजन कार्यक्रम में पूर्व विधायक सत्यनारायण पटेल, कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता राजेश चौकसे के आतिथ्य में भाजपा नेता महेश जीनवाल, इंटक नेता लक्ष्मीनारायण पाठक, हरनाम सिंह धालीवाल एवं देवीसिंह सेंगर की उपस्थिति में पंडित राजेश पांडे, जानकीलाल पटेरिया, प्रकाश महावर कोली, नरेंद्र श्रीवंश, किसन बोकरे, दिलीप माथुर, नारायण कुशवाह, शिवप्रसाद, किशोर करोसिया, हंसराज वर्मा एवं सुरेन्द्र शर्मा सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थिती में विधिवत पूजन कर झांकी निर्माण का शुभारंभ किया। तथा झांकी कलाकार नरेंद्र पप्पू बैरवा का स्वागत किया गया।
इस अवसर पर स्वदेशी मिल गणेश उत्सव समिति के अध्यक्ष कन्हैयालाल मरमट, उपाध्यक्ष चम्पालाल वर्मा, कोषाध्यक्ष हीरालाल वर्मा, मदन पलमालिया, कैलाश कुशवाह सहित समिति के पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे।
मिलें बंद हुईं, लेकिन परम्परा नहीं
स्वदेशी मिल की यह गणेशोत्सव परम्परा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इन्दौर के श्रमिक इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता की जीवंत पहचान है। कभी कपड़ा मिलों के हजारों श्रमिक गणेशोत्सव और झांकियों की तैयारियों में जुटते थे। आज मिलों की चिमनियों ने भले धुंआ उगलना बंद कर दिया हो, लेकिन उन श्रमिकों द्वारा स्थापित आस्था और परम्परा की लौ आज भी प्रज्वलित है।
97वें वर्ष में प्रवेश कर रही स्वदेशी मिल गणेशोत्सव समिति की तीन झांकियां इस बात का प्रमाण हैं, कि समय बदल सकता है, परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन इन्दौर की सांस्कृतिक विरासत और गणपति बप्पा के प्रति आस्था की परम्परा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहेगी।

