आखिर हमारे देश को किसकी नज़र लग गई है?
संपादकीय
आज देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ हर दिन कोई न कोई ऐसी घटना सामने आती है जो मन को विचलित कर देती है। कहीं युवा अपने भविष्य और रोजगार की चिंता में सड़कों पर उतर रहा है, कहीं मंदिरों में चोरी की घटनाएँ आस्था को ठेस पहुँचा रही हैं, तो कहीं अपराध, सामाजिक तनाव और नैतिक मूल्यों में गिरावट समाज को चिंतित कर रही है। ऐसे में हर भारतीय के मन में एक ही प्रश्न उठता है—आखिर हमारे देश को किसकी नज़र लग गई है?
भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। जब यही समाज असहिष्णुता, अविश्वास और स्वार्थ की ओर बढ़ने लगता है, तो यह केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी बन जाती है। युवा यदि सड़क पर है तो उसकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए। धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए और कानून का भय अपराधियों में स्पष्ट दिखाई देना चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि देश का भविष्य केवल सरकारें नहीं बदलतीं, बल्कि जागरूक नागरिक, जिम्मेदार युवा और नैतिक समाज मिलकर बदलते हैं। हमें अपने कर्तव्यों का भी उतना ही पालन करना होगा जितना हम अपने अधिकारों की बात करते हैं।
आज समय निराशा का नहीं, आत्ममंथन का है। यदि हम सब मिलकर ईमानदारी, सद्भाव और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें, तो कोई भी संकट भारत की प्रगति को रोक नहीं सकता। देश को किसी की नज़र नहीं, बल्कि हमारी एकता, जागरूकता और सकारात्मक सोच की आवश्यकता है।
— गोपाल गावंडे
प्रधान संपादक, रणजीत टाइम्स

