भाजपा का ग़ज़ब मीडिया संवाद....?

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राजेश धाकड़ 
भोपाल के मिंटो हॉल में मोदी सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक भव्य "मीडिया संवाद" का आयोजन किया गया। मंच सजा था, कुर्सियाँ सजी थीं, सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद थी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान उपलब्धियों का पुलिंदा लेकर उपस्थित थे। उन्होंने सरकार की बारह वर्षों की उपलब्धियाँ गिनाईं। उपलब्धियाँ भी ऐसी-ऐसी कि कुछ देर के लिए लगा मानो बुद्धिजीवियों को बुद्धू बनाने का कोई विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा हो।

वैसे "संवाद" शब्द का अर्थ होता है दो या दो से अधिक लोगों के बीच विचारों का आदान-प्रदान। संवाद का मतलब सवाल और जवाब दोनों होता है। संवाद का उद्देश्य समझ बढ़ाना, जिज्ञासाओं का समाधान करना और विभिन्न पक्षों को सुनना होता है। लोकतंत्र में मीडिया संवाद का अर्थ तो और भी व्यापक है, जहाँ पत्रकार जनता की ओर से सत्ता से सवाल करते हैं और सत्ता जवाब देती है।

लेकिन भोपाल में आयोजित इस अद्भुत "मीडिया संवाद" ने संवाद की सारी पारंपरिक परिभाषाओं को नया रूप दे दिया। यहाँ संवाद कम और प्रवचन अधिक था।

पत्रकारों के कैमरे भीतर नहीं गए। मोबाइल फोन पर निगाहें थीं। रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं थी। सवाल पूछने की अनुमति नहीं थी। केवल बैठकर सुनना था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पत्रकार किसी प्रेस वार्ता में नहीं बल्कि किसी विशेष आध्यात्मिक कथा के श्रोता बनकर आए हों, जहाँ कथा वाचक बोलेंगे और श्रोता केवल सिर हिलाकर श्रद्धा प्रकट करेंगे।

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन यहाँ स्तंभ बनने से पहले ही उसे दर्शक दीर्घा में बैठा दिया गया। सबसे रोचक प्रसंग तो यह रहा कि यदि कोई काली शर्ट पहनकर पहुँच गया तो उसके प्रवेश पर भी सवाल खड़े हो गए। अब तक हमने नेताओं की नाकाबंदी, विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदी और अघोषित आपातकाल जैसे शब्द सुने थे, लेकिन पत्रकारों की "वस्त्रबंदी" का यह नया अध्याय भी देखने को मिल गया। लगता है अब लोकतंत्र में विचारों के साथ-साथ रंगों की भी राजनीतिक वैधता तय की जाने लगी है।

मीडिया संवाद में पत्रकारों की भूमिका वही थी जो रेडियो पर "मन की बात" सुनते समय श्रोताओं की होती है। फर्क सिर्फ इतना था कि वहाँ रेडियो होता है और यहाँ मंत्री महोदय स्वयं उपस्थित थे। सुनना अनिवार्य था, पूछना वर्जित था और रिकॉर्ड रखना भी लगभग अपराध जैसा प्रतीत हो रहा था।

अब प्रश्न यह है कि यदि पत्रकार सवाल नहीं पूछेंगे तो संवाद किस बात का? यदि कैमरे नहीं जाएंगे तो पारदर्शिता कहाँ है? यदि रिकॉर्डिंग नहीं होगी तो जवाबदेही कैसे तय होगी? और यदि केवल उपलब्धियाँ ही सुनाई जाएँगी तो फिर उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों कहा जाए? उसे सीधे-सीधे "सरकारी उपलब्धि पाठ" नाम दे दिया जाए।

संभवतः आयोजकों को डर रहा होगा कि कहीं कोई असुविधाजनक प्रश्न माहौल खराब न कर दे। क्योंकि प्रश्नों की एक बुरी आदत होती है वे तथ्यों की मांग करते हैं। और कभी-कभी तथ्य भाषणों के साथ सहज नहीं बैठते।

देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल हैं, बेरोज़गारी पर सवाल हैं, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सवाल हैं, नई शिक्षा नीति के प्रभाव पर सवाल हैं। स्वाभाविक था कि पत्रकार इन विषयों पर प्रश्न पूछते। लेकिन संवाद में प्रश्नों की जगह यदि केवल प्रशंसा का अधिकार हो, तो फिर वह संवाद नहीं, एकतरफ़ा प्रसारण बन जाता है।

लोकतंत्र में सत्ता को सवालों से डरना नहीं चाहिए। सवाल विरोध नहीं होते, बल्कि जवाबदेही का माध्यम होते हैं। जिस दिन सत्ता सवालों को शत्रु समझने लगे और पत्रकारों को केवल श्रोता, उस दिन संवाद की आत्मा घायल हो जाती है।

भोपाल का यह आयोजन शायद आने वाले समय की पत्रकारिता का नया मॉडल प्रस्तुत कर रहा है जहाँ पत्रकार आएँ, बैठें, सुनें, ताली बजाएँ और धन्यवाद देकर लौट जाएँ। न कोई प्रश्न, न कोई प्रतिप्रश्न, न कोई असहमति। और यदि यही पत्रकारिता का भविष्य है, तो फिर चिंता केवल मीडिया की नहीं, लोकतंत्र की भी है।

क्योंकि जिस लोकतंत्र में संवाद की जगह प्रवचन ले ले, वहाँ प्रश्न पूछने वालों की संख्या कम होने लगती है और सुनने वालों की भीड़ बढ़ने लगती है।

बाकी भोपाल में पत्रकारिता की हालत देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वह अभी आईसीयू में है, कुछ लोग उसे वेंटिलेटर पर मान रहे हैं, और कुछ लोग उसकी नब्ज़ टटोलकर अभी भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद कभी फिर कोई वास्तविक "मीडिया संवाद" देखने को मिले जहाँ पत्रकार सवाल पूछ सकें और सत्ता जवाब देने का साहस दिखा सके।

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