बुरहानपुर का 'प्राकृतिक हाट बाजार': कागजों पर सफलता, धरातल पर घोर लापरवाही !

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उपसंचालक के 'दावे' बनाम हकीकत: बुरहानपुर में प्राकृतिक खेती का शोर, बाजार में सन्नाटा
एक किसान और कई उत्पाद से कई सवालों का अंबार: बुरहानपुर कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल
महेन्द्र मालवीय रणजीत टाईम्स
बुरहानपुर। जिला प्रशासन द्वारा प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू किया गया 'प्राकृतिक हाट बाजार' अब सवालों के घेरे में है। विभाग द्वारा जहाँ अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन और सफलता के दावे किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत है। सबसे गंभीर बात यह है कि जब इस मामले में उपसंचालक कृषि एम.एस. देवके से सवाल किए गए, तो उनके जवाबों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा कर दिया है।
अधिकारी का दावा और हकीकत का सच
जब इस हाट बाजार की अव्यवस्थाओं को लेकर उपसंचालक कृषि एम.एस. देवके से बात की गई, तो उन्होंने दावा किया कि बाजार में 6 से 7 किसान अपने उत्पाद लेकर पहुंचे थे। लेकिन, जब उन्हें अवगत कराया गया कि हाट बाजार शुरू होने के पूर्व से लेकर अंत तक वहां मौजूद रहने के दौरान केवल एक ही किसान मौजूद था, तो अधिकारी के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। उन्होंने अनभिज्ञता जताते हुए कहा, "अच्छा, मुझे तो बताया गया था कि 6-7 किसान आए थे।" यह बयान स्पष्ट करता है कि अधिकारी धरातल पर हो रही गतिविधियों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं या उन्हें गलत रिपोर्ट दी जा रही है।
जैविक का प्रमाण क्या? अधिकारी ने पल्ला झाड़ा
बाजार में एक ही किसान भिंडी, कटहल, हल्दी पाउडर, सूखी मिर्च और तुवर दाल जैसे विभिन्न उत्पाद लेकर बैठा था। एक ही किसान द्वारा इतनी विविधतापूर्ण खेती कैसे संभव है? और सबसे बड़ी बात, इन उत्पादों के 'जैविक' (Organic) होने का क्या प्रमाण है? इन सवालों पर अधिकारी ने सीधे जवाब देने के बजाय पल्ला झाड़ते हुए कहा, "किसानों के खेतों में जाकर देखें।" कृषि विभाग का यह उत्तर उसकी जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। क्या विभाग का काम केवल प्रचार करना है, या फिर उपभोक्ताओं को बेचे जा रहे उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी ?
पंजीकृत किसान गायब, क्योंकि 'दम' नहीं
जिले में प्राकृतिक खेती के नाम पर कृषि विभाग में सैकड़ों किसान पंजीकृत हैं, फिर भी हाट बाजार में उनकी उपस्थिति नगण्य है। इस पर उपसंचालक ने स्वीकार किया कि "किसानों को उचित दाम मिलेंगे तो वे आएंगे।" यह बयान खुद विभाग के इस हाट बाजार मॉडल की विफलता को स्वीकार करता है। यदि बाजार किसानों को लाभ नहीं दिला पा रहा है, तो विभाग किस आधार पर इसे सफल बताकर वाहवाही लूटने में लगा है ?
व्यवस्था के नाम पर केवल खानापूर्ति
हाट बाजार की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ न पेयजल की व्यवस्था है, न बैठने का स्थान और न ही स्वच्छता। हाट बाजार से कुछ दूरी  पर लगे कचरे के ढेर और समय की पाबंदी का न होना यह साबित करता है कि प्रशासन इसे लेकर कतई गंभीर नहीं है। सरकारी दफ्तरों से जारी प्रेस विज्ञप्तियाँ और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर एक बड़े घोटाले या प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा कर रहा है।
पत्रकार का तीखा सवाल:
यदि बाजार में केवल एक ही किसान था, तो अधिकारी 6-7 किसानों के आने का दावा किस आधार पर कर रहे थे ?
क्या विभाग के पास पंजीकृत किसानों की सूची केवल सरकारी कागजों तक सीमित है ?
बिना किसी प्रमाणन या टेस्टिंग के आम जनता को 'जैविक' के नाम पर क्या भरोसा दिलाया जा रहा है ?
 बुरहानपुर का यह 'प्राकृतिक हाट बाजार' केवल सरकारी लीपापोती का उदाहरण बनकर रह गया है। यदि विभाग वास्तव में किसानों और उपभोक्ताओं के हित में काम करना चाहता है, तो उसे दिखावटी पोस्टरबाजी छोड़कर हाट बाजार की व्यवस्था सुधारने और उत्पादों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने पर ध्यान देना होगा। अन्यथा, यह केवल सरकारी बजट की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है।

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