सहज योग में साधकों को मिलता है स्वंय के गुरु होने का सम्मान
गुरु आध्यात्मिक उन्नति की आकांक्षा करने वाले सभी साधकों के लिए महत्वपूर्ण है। बिन गुरु ज्ञान संभव नहीं और सही ज्ञान के बगैर आत्मिक उत्थान संभव नहीं। अज्ञान, अहंकार, धैर्य की कमी और सही मापदंड के बजाय चमत्कार या बाहरी दिखावे की चाह हमारे आध्यात्मिक उत्थान में बाधा है।
गुरु को तलाश रहे साधकों के लिए सहज योग का द्वार सदैव खुला है। सहज योग में आत्म-साक्षात्कार व कुंडलिनी जागरण के माध्यम से साधक के भीतर परम चैतन्य अथार्त ठंडी हवा का प्रवाह शुरू होता है। साधक को अपने सूक्ष्म चक्रों का ज्ञान हो जाता है, जिससे वह स्वयं का गुरु बनकर अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर कर सकता है। यह मार्ग किसी अंधविश्वास पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित है क्योंकि यह एक जीवंत क्रिया है।
सहज योग प्रणेता परमपूज्य श्री माताजी निर्मला देवी कहती है, 'मनुष्य की उत्क्रांति का आरंभ नाभी से होता है जो भवसागर से घिरा हुआ है।' भवसागर में दस गुरुओं का स्थान है। सच्चे गुरु ही भक्त का ईश्वर से मिलन का योग घटित करते हैं। ईश्वर से योग घटित होने के लिए साधक को भवसागर तरना यानि पार करना पड़ता है। सद्गुरु ही वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश दे भक्त को ईश्वर के साम्राज्य में प्रवेश कराता है।"
कोई गुरु में ही यह सामर्थ्य होता है कि साधक के भवसागर की रिक्तता को दूर करा सके। परमपूज्य श्री माताजी निर्मला देवी की कृपा से सहज योग के साधक इस रिक्तता को दूर कर पाते हैं क्योंकि कुंडलिनी के भवसागर को पार करने का मार्ग हमारे मध्य नाड़ी सुषुम्ना से होकर जाता है, फलस्वरूप सहज योगी साधक स्वयं अपना गुरु बन जाते हैं। सहज योग में साधक स्वयं के गुरु पद को प्राप्त करता है। यहाँ कोई सहजी साधक अन्य किसी साधक के गुरु बनने का प्रयास नहीं करता है, बस सभी अपने स्वयं के गुरु बने रहने के लिए प्रयासरत रहता है। परमपूज्य श्री माताजी को सहजी साधक गुरु नहीं श्री माताजी कहते हैं क्योंकि वे आदिशक्ति हैं और असंख्य गुरुओं की जननी भी है।
भवसागर तरने का मार्ग सुषुम्ना नाड़ी है और आत्मसाक्षात्कार व संतुलन पाने के बाद जब साधक चैतन्य लहरियों का आनंद लेना शुरू कर देता है तब दूसरों को भी संतुलित करना उसकी जिम्मेदारी हो जाती है। जलवायु, प्रकृति, वातावरण, समाज और मनुष्यों को संतुलित करने की जिम्मेदारी प्रत्येक साधक को होती है। यह संतुलित होने व करने का भाव ही गुरुत्व है। साधक में संतुलन आना जरुरी है ताकि वह सहज योग का एक सशक्त माध्यम बन सके। स्वयं का गुरु बनने व आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं। सहज योग सदैव निशुल्क है।

