इंदौर नगर निगम: 1870 की नगरपालिका से स्वच्छता की राष्ट्रीय पहचान तक

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156 वर्षों का सफर—नगरपालिका से महानगर तक, और देश में स्वच्छता की मिसाल बनने की कहानी
इंदौर। आज इंदौर की पहचान केवल मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी या खान-पान के शहर के रूप में नहीं है। नगर प्रबंधन और स्वच्छता के क्षेत्र में भी इंदौर ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन जिस इंदौर को आज हम व्यवस्थित सड़कों, घर-घर कचरा संग्रहण और स्वच्छता की मजबूत व्यवस्था के लिए जानते हैं, उसकी नगरीय प्रशासन की यात्रा लगभग डेढ़ शताब्दी पुरानी है।

1870 में हुई नगरपालिका की शुरुआत

इंदौर नगर निगम के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 19वीं सदी में शहर के बढ़ने के साथ पानी, नालियों, सफाई और कचरा निपटान जैसी बुनियादी सुविधाओं के नियोजित प्रबंधन की आवश्यकता महसूस होने लगी। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1870 में इंदौर की पहली नगरपालिका का गठन किया गया और बख्शी खजान सिंह को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

यहीं से इंदौर में संस्थागत शहरी प्रशासन की शुरुआत मानी जा सकती है।

1906 में बिजली और जल व्यवस्था की दिशा में कदम

नगरपालिका बनने के बाद इंदौर ने धीरे-धीरे आधुनिक नगरीय सुविधाओं की तरफ कदम बढ़ाए। नगर निगम के इतिहास के अनुसार 1906 में इंदौर नगरपालिका ने अपना पावर हाउस शुरू किया और बिलावली जलाशय से नई जलापूर्ति व्यवस्था स्थापित की।

उस दौर में किसी भारतीय शहर के लिए बिजली और संगठित जलापूर्ति व्यवस्था विकसित करना एक महत्वपूर्ण शहरी उपलब्धि थी।

1912: निर्वाचित नगरीय सरकार की ऐतिहासिक शुरुआत

इंदौर के नगरीय इतिहास का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव 1912 में आया। नगर निगम के आधिकारिक विवरण के मुताबिक इंदौर नगरपालिका देश में निर्वाचित नगरपालिका सरकार की व्यवस्था अपनाने वाले शुरुआती शहरों में थी और IMC इसे भारत की पहली निर्वाचित municipal government के रूप में दर्ज करता है।

इस व्यवस्था ने नागरिकों और नगरीय शासन के बीच लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की नींव मजबूत की।

आजादी के बाद बदला प्रशासनिक स्वरूप

1947 में देश की आजादी के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था बदली। इंदौर मध्य भारत का हिस्सा बना। मध्य भारत के स्थानीय शासन विभाग ने इंदौर को प्रथम श्रेणी की नगरपालिका का दर्जा दिया।

इसके बाद 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के साथ इंदौर नवगठित मध्यप्रदेश का हिस्सा बना और उसी वर्ष इंदौर को नगर निगम का दर्जा मिला।

यहीं से आधुनिक Indore Municipal Corporation—इंदौर नगर निगम का दौर शुरू हुआ।

नगरपालिका से विशाल नगर निगम तक

1870 में शुरू हुई नगरपालिका आज एक विशाल शहरी प्रशासनिक संस्था बन चुकी है।

वर्तमान व्यवस्था में इंदौर नगर निगम क्षेत्र 85 वार्ड और 22 जोन में विभाजित है। प्रत्येक वार्ड से जनता अपना पार्षद चुनती है। नगर निगम में महापौर के साथ 85 निर्वाचित पार्षद, नगर निगम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद तथा संबंधित विधानसभा क्षेत्रों के विधायक भी वैधानिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

2026 में पुष्यमित्र भार्गव इंदौर के 24वें महापौर हैं।

नगर निगम के जिम्मे आज केवल सफाई नहीं, बल्कि सड़क, स्ट्रीट लाइट, जल वितरण, ड्रेनेज, सीवरेज, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, उद्यान, भवन अनुमति, राजस्व और शहर की अनेक नागरिक सेवाएँ आती हैं।

राजनीतिक दौर बदलते रहे, शहर आगे बढ़ता रहा

आजादी के बाद इंदौर और मध्यप्रदेश में अलग-अलग राजनीतिक दौर आए। राज्य सरकारें बदलीं, नगर निगम के निर्वाचित नेतृत्व और प्रशासनिक अधिकारियों में परिवर्तन होते रहे।

नगर निगम के विकास को किसी एक व्यक्ति या एक कार्यकाल की उपलब्धि के रूप में देखना पूरा इतिहास नहीं होगा। इंदौर के विकास में विभिन्न समय के महापौरों, पार्षदों, नगर निगम आयुक्तों, अधिकारियों, सफाई कर्मचारियों, सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और सबसे महत्वपूर्ण—इंदौर की जनता—की भूमिका रही है।

लेकिन स्वच्छता की कहानी बिल्कुल अलग है

आज जिस उपलब्धि ने इंदौर को पूरे देश में पहचान दिलाई है, वह है—स्वच्छता।

यह बदलाव एक दिन में नहीं आया।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि Swachh Survekshan 2014 में इंदौर की रैंक 149 थी। 2016 में मिलियन-प्लस शहरों में रैंक 25 थी।

लेकिन इसके बाद ऐसा बदलाव हुआ जिसने देश का ध्यान इंदौर की ओर खींच दिया।

2017 में इंदौर 434 शहरों के Swachh Survekshan में पहली बार देश का नंबर-1 स्वच्छ शहर बना।

यह छलांग केवल रैंकिंग की नहीं थी—यह शहर के व्यवहार में आए परिवर्तन की कहानी थी।

घर-घर से कचरा उठाना बना गेम चेंजर

स्वच्छता व्यवस्था में इंदौर ने कचरे को सड़क और खुले कचरा स्थलों से हटाकर घर से ही अलग-अलग एकत्र करने की व्यवस्था पर जोर दिया।

घर-घर कचरा संग्रहण, स्रोत पर कचरे का पृथक्करण, गीले-सूखे और अन्य प्रकार के कचरे का अलग प्रबंधन, कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण, खुले कचरा स्थलों को समाप्त करना और नागरिक सहभागिता—इन सभी ने मिलकर शहर का मॉडल बदल दिया।

बाद में यही सिद्धांत Swachh Bharat Mission Urban 2.0 के प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्यों—100% door-to-door collection, source segregation और scientific waste management—का भी हिस्सा बने।

2017 से शुरू हुआ नंबर-1 का सिलसिला

2017 में पहली बार नंबर-1 बनने के बाद इंदौर ने अपनी स्थिति बनाए रखी।

2017 — नंबर 1
2018 — नंबर 1
2019 — नंबर 1

भारत सरकार ने 2019 के परिणाम जारी करते समय भी दर्ज किया कि इंदौर लगातार तीन वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब बनाए हुए था।

इसके बाद भी इंदौर का सफर जारी रहा और शहर ने लगातार छह बार अकेले देश के सबसे स्वच्छ शहर का स्थान हासिल किया।

Swachh Survekshan 2023 में परिणाम का स्वरूप बदला और इंदौर तथा सूरत संयुक्त रूप से सबसे स्वच्छ शहर घोषित हुए। भारत सरकार ने उस समय आधिकारिक रूप से उल्लेख किया कि इंदौर इससे पहले लगातार छह वर्षों तक अकेले शीर्ष स्थान पर रहा था।

अब नंबर-1 से आगे—‘Super Swachh League’

स्वच्छता सर्वेक्षण की व्यवस्था में बाद में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया।

लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले शहरों को सामान्य रैंकिंग में बार-बार मुकाबला कराने के बजाय Super Swachh League बनाई गई।

Swachh Survekshan 2024-25 में इंदौर, सूरत और नवी मुंबई सहित उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले शहर Super Swachh League में शामिल किए गए।

10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की Super Swachh League की आधिकारिक सूची में इंदौर शामिल है।

इसलिए 2026 में इंदौर की स्थिति को केवल “आठवीं या नौवीं बार नंबर-1” कह देना तकनीकी रूप से सही तस्वीर नहीं देता। अब इंदौर लगातार शीर्ष प्रदर्शन के कारण Super Swachh League का हिस्सा है।

सफाई से आगे बढ़कर ‘स्वच्छता मॉडल’

इंदौर की उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शहर ने स्वच्छता को केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी नहीं रहने दिया।

नागरिकों को कचरा अलग करने के लिए प्रेरित किया गया, घर-घर वाहन पहुँचाए गए, सफाई कर्मचारियों की भूमिका मजबूत हुई, कचरे के प्रसंस्करण पर ध्यान दिया गया और लगातार निगरानी की व्यवस्था विकसित हुई।

स्वच्छता अभियान में प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ आम नागरिकों की भागीदारी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी कारण आज देश के दूसरे शहर भी इंदौर के अनुभव से सीख रहे हैं। 2026 में केंद्र सरकार के Swachh Shehar Jodi कार्यक्रम के अंतर्गत इंदौर ने देपालपुर के साथ मिलकर वहां कचरा पृथक्करण और legacy waste remediation में मार्गदर्शक शहर की भूमिका निभाई।

1870 से 2026—156 वर्षों का परिवर्तन

यदि इंदौर की इस पूरी यात्रा को एक समयरेखा में देखें तो तस्वीर बहुत स्पष्ट दिखाई देती है—

1870 — पहली नगरपालिका का गठन
1906 — नगरपालिका का अपना पावर हाउस और नई जलापूर्ति व्यवस्था
1912 — निर्वाचित नगरपालिका शासन की ऐतिहासिक शुरुआत
1947 के बाद — मध्य भारत में प्रथम श्रेणी नगरपालिका
1956 — मध्यप्रदेश गठन के साथ इंदौर नगर निगम बना
2014 — स्वच्छता सर्वेक्षण में 149वीं रैंक
2016 — मिलियन-प्लस शहरों में 25वीं रैंक
2017 — पहली बार देश का सबसे स्वच्छ शहर
2018–2022 — लगातार शीर्ष स्थान का सिलसिला
2023 — इंदौर और सूरत संयुक्त रूप से सबसे स्वच्छ शहर
2024-25 — इंदौर Super Swachh League में शामिल
2026 — इंदौर का स्वच्छता अनुभव दूसरे नगरीय निकायों के लिए mentorship मॉडल के रूप में भी उपयोग हो रहा है।

इंदौर की असली ताकत—जनभागीदारी

156 वर्षों की यह कहानी केवल नगर निगम की संस्था की कहानी नहीं है।

यह उस शहर की कहानी है जिसने समय के साथ अपनी प्रशासनिक व्यवस्था बदली, आबादी और क्षेत्र के विस्तार के साथ नागरिक सुविधाओं का ढांचा विकसित किया और फिर स्वच्छता को शहर की पहचान बना दिया।

महापौर बदलते रहे, आयुक्त बदलते रहे, पार्षद बदलते रहे और सरकारें भी बदलती रहीं—लेकिन शहर का संस्थागत विकास लगातार आगे बढ़ता रहा।

स्वच्छता के क्षेत्र में इंदौर की सबसे बड़ी सीख यही है कि कोई भी नगर निगम केवल आदेश देकर शहर को लंबे समय तक स्वच्छ नहीं रख सकता। प्रशासनिक व्यवस्था, सफाई कर्मचारियों की मेहनत, राजनीतिक नेतृत्व, तकनीक, निगरानी और नागरिक अनुशासन—इन सभी का साथ होना जरूरी है।

1870 में पानी, नाली और सफाई जैसी बुनियादी समस्याओं को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से बनी नगरपालिका से लेकर 2026 के Super Swachh League वाले इंदौर तक का सफर बताता है कि शहर की पहचान केवल इमारतों और सड़कों से नहीं बनती—शहर की सबसे बड़ी ताकत उसके नागरिक और उसकी व्यवस्था होती है।

— विशेष आलेख
रंजीत टाइम्स

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