“बात भाव कि नहीं भय की

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बेटियों पर लेख _

समाज बदलेगा, तभी बेटियाँ मुस्कुराएँगी”

डॉ. पवन आर्य राष्ट्रीय प्रभारी सुदर्शन न्यूज (राष्ट्रनिर्माण)


आजकल लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जहाँ किसी बेटी की मौत को कभी आत्महत्या कहा जाता है, कभी हत्या, और कभी सच्चाई वर्षों तक धुंध में खोई रह जाती है। कानून अपना काम कर रहा है, सरकार और न्यायपालिका भी सक्रिय हैं… लेकिन एक सवाल है जो हर घटना के बाद मन को भीतर तक झकझोर देता है - क्या ये बेटियाँ उस दिन मरीं, या वे मानसिक रूप से बहुत पहले ही टूट चुकी थीं? किसी घटना के बाद समाज अचानक जाग जाता है। लोग कहते हैं -“अगर परेशान थी तो बताया क्यों नहीं?”
“इतनी पढ़ी-लिखी थी, कोई और रास्ता चुन लेती”“इतना सब सहन क्यों किया?” पर क्या हमने कभी सचमुच यह जानने की कोशिश की कि वह कहना किससे चाहती थी? क्या कोई उसे बिना जज किए सुनने के लिए तैयार था? क्या उसके चेहरे की थकान, उसकी खामोशी, , गुस्सा, उसकी बुझती हुई मुस्कान किसी को दिखाई नहीं देती थी? सच तो यह है कि अक्सर लोग सब समझते हैं, पर स्वीकार नहीं करना चाहते।
हमारे समाज में शादी के बाद लड़की को सबसे पहले जो सलाह दी जाती है, वह होती है- 
“थोड़ा एडजस्ट कर”, “हर घर में ऐसा होता है”, “समय के साथ सब ठीक हो जाएगा”, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि आखिर उसके भीतर क्या टूट रहा है।
एक लड़की अपना घर, अपना परिवेश, अपने सपने और कई बार अपनी पहचान तक बदल देती है। ऐसे में उसे सबसे ज्यादा जरूरत होती है अपनापन, संवाद और भावनात्मक सुरक्षा की। पर विडंबना यह है कि शादी के बाद उसकी बातें सुनने वाला शायद ही कोई होता है। अगर वह अपनी पीड़ा कहे तो उसे कमजोर, ज़िद्दी या “घर न संभाल पाने वाली” कह दिया जाता है। यही चुप्पी धीरे-धीरे एक ऐसे अंधेरे में बदल जाती है जहाँ उसे अपना अस्तित्व बोझ लगने लगता है। हम समय के साथ तकनीक में तो बहुत आगे बढ़ गए हैं। मोबाइल बदल गए, सोचने के तरीके बदल गए, दुनिया डिजिटल हो गई, लेकिन क्या सच में हमारी मानसिकता बदली? आज भी कई घरों में लड़के और लड़की में फर्क किया जाता है। यह बहुत कड़वी सच्चाई है कि आज भी कहीं बेटी के जन्म पर चेहरे उतर जाते हैं, और अनजाने में ही एक आह निकल पड़ती है - “काश बेटा होता”, शायद यही डर अब कई लड़कियों के भीतर घर करता जा रहा है।
कई महिलाएँ माँ बनने से डरती है। अगर पहली संतान बेटी हो जाए, तो दूसरी बार भी उनके मन में भय रहता है — “कहीं फिर बेटी न हो जाए” सोचिए, उस स्त्री के मन में कितने सवाल, कितने तूफ़ान चलते होंगे - पर शायद ही कोई उन्हें समझने की कोशिश करता है।
एक लड़की जब अपने परिवार के लिए त्याग करती है, अपने सपनों को पीछे छोड़ देती है, अपनी इच्छाओं को दबा देती है, तब अक्सर उसके बलिदान को बहुत सहजता से यह कहकर किनारे कर दिया जाता है -“उसकी अपनी मर्जी थी, हमने तो रोका नहीं था”, लेकिन सच यह है कि हर इंसान को सिर्फ शब्दों में नहीं, भावनाओं में सम्मान चाहिए होता है। कोई पहचान मंचों पर नहीं मांगता, वह लोगों की नजरों में अपना महत्व महसूस करना चाहता है। दुख की बात यह भी है कि शादी के बाद एक लड़की से उम्मीद की जाती है कि उसमें हर परिस्थिति को संभालने की समझ हो, हर रिश्ते को निभाने का धैर्य हो, हर समस्या का समाधान हो। लेकिन उसी परिवार के अपने बेटे अक्सर “अभी बच्चे हैं”, “समझदार नहीं हैं” कहकर बचा लिए जाते हैं। फिर एक दिन ऐसा आता है जब उस लड़की के सब्र का बांध टूट जाता है। जब उसे आगे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। जब उसकी बात सुनने वाला, उसकी पीड़ा बाँटने वाला कोई नहीं होता। तब उसके भीतर दबे हुए शब्द, वर्षों का दर्द, अपमान और गुस्सा एक साथ बाहर आने लगता है। और उस अवस्था में शायद उसे यह दुनिया भी अच्छी नहीं लगती, कई बार वह खुद को भी अच्छा नहीं समझ पाती। उसे कुछ समझ नहीं आता, किसी की परवाह नहीं रहती, क्योंकि भीतर से वह पूरी तरह टूट चुकी होती है। हमें यह समझना होगा कि हर बार मोमबत्ती जलाने से पहले, हर न्याय की मांग से पहले, समाज को आत्ममंथन की जरूरत है।
आज बहुत-सी लड़कियाँ पढ़-लिखकर, आत्मनिर्भर बनने के बाद भी विवाह से डरती हैं। और समाज उन्हें ताना देता है -“ज़्यादा पढ़ ली है इसलिए भाव बढ़ गए हैं” लेकिन शायद बात “भाव” की नहीं, भय की है। उन्हें डर है उस जीवन से जहाँ उनकी भावनाओं से ज्यादा “समाज क्या कहेगा” को महत्व दिया जाएगा। यह कड़वा है, लेकिन सच है कि हमारे समाज में आज भी कई जगह गलती परिस्थितियों की नहीं, सीधे लड़की की मान ली जाती है। “वह चुप रहे तो गलत, बोले तो गलत, सहन करे तो कमजोर
और विरोध करे तो संस्कारहीन।“ फिर हम हैरान होते हैं कि आखिर कोई इतना बड़ा कदम क्यों उठा लेता है।
सिर्फ बेटियों की काउंसलिंग काफी नहीं है, समाज की काउंसलिंग भी उतनी ही आवश्यक है।
जरूरत पूरे समाज को संवेदनशील बनाने की है — परिवारों को, रिश्तेदारों को, पड़ोसियों को, और सबसे ज्यादा उस मानसिकता को जो आज भी भावनाओं से ज्यादा दिखावे को महत्व देती है। अगर सच में बदलाव चाहिए, तो जागरूकता सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
घर-घर में संवाद होना चाहिए। बेटियों को “समझाने” से पहले उन्हें “समझना” सीखना होगा। रिश्तों में अधिकार से ज्यादा सम्मान देना होगा। और यह स्वीकार करना होगा कि मानसिक पीड़ा भी उतनी ही वास्तविक होती है जितना शरीर का घाव।
नई पीढ़ी सब देख रही है, सब समझ रही है। अगर आज भी हम नहीं बदले, तो आने वाला समय और भी भयावह हो सकता है। अभी भी समय है — संभलने का, सोच बदलने का, और एक ऐसा समाज बनाने का जहाँ बेटियाँ सिर्फ जीवित न रहें, बल्कि सम्मान और अपनत्व के साथ जी भी सकें।

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