अब कुछ हो नहीं सकता, लेकिन सबक सीखे जा सकते हैं...
राजेश धाकड़
75 की उम्र में दूरदराज गांव में केवल एक केयरटेकर के साथ रहना सलाह के योग्य नहीं है. वह बुजुर्ग आप हो या दोस्त / रिश्तेदार!
कार्डियक अरेस्ट या हार्ट अटैक जैसी स्थितियों में 'गोल्डन ऑवर' (पहले 30 से 60 मिनट) निर्णायक होते हैं. गांव या फार्महाउस में उन्नत लाइफ-सपोर्ट, डीफिब्रिलेटर और कार्डियोलॉजिस्ट की तत्काल उपलब्धता न होना सबसे बड़ा जोखिम साबित होता है.
एक सामान्य केयरटेकर तब तक असहाय रहता है जब तक कि उसे सीपीआर (CPR) न आता हो या उसके पास तुरंत एम्बुलेंस बुलाने की साधन-संपन्न व्यवस्था न हो.
घबराहट होने पर सबसे पहले केयरटेकर को बुलाकर डॉक्टर/एम्बुलेंस/रिश्तेदारों को SOS या कॉल करने के स्टेडिंग ऑर्डर होने थे. लापरवाह / नासमझ केयरटेकर पर भरोसा नहीं करना चाहिए.
मित्र को कॉल करने के बजाय मैसेज भेजना भूल साबित हुई. तीव्र कार्डियक अरेस्ट या भारी बेचैनी के दौरान व्यक्ति के पास सोचने और प्रतिक्रिया करने का टाइम बहुत कम होता है। ऐसे में मैसेज टाइप करना और उस पर सामने वाले का ध्यान जाने में देरी होना जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में ऐसे व्यक्ति को फोन करना चाहिए जो रिसोर्सफुल हो, तत्काल डॉक्टर और एम्बुलेंस बुला सके.आपात स्थिति में डायरेक्ट कॉल या सिंगल-क्लिक एसओएस (SOS) अलार्म ही एकमात्र प्रभावी विकल्प होता है।
गुस्सैल बुजुर्ग लोगों का बीपी /शुगर असामान्य रहता हैं. उन्हें अस्पताल के पास रहना चाहिए.
आज मुझे ऐसी बातें नहीं लिखनी चाहिए थी लेकिन लिख रहा हूं इससे कई लोगों को बुरा लगेगा. मुझे भी बुरा लग रहा है. लेकिन मैं अमिताभ बच्चन का उदाहरण देना चाहता हूं जिन्होंने जुहू के अपने बंगले में पहली मंजिल पर 24 घंटे चालू रहने वाला आईसीयू बना रखा है और डॉक्टर हमेशा 24 घंटे उपलब्ध रहता है. अपनी सेहत की रक्षा करना और तत्काल चिकित्सा व्यवस्था हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. हालांकि अंजाम हमारे हाथ में नहीं!

