असली और नकली पत्रकार: आखिर कब होगी पहचान?
पत्रकार :- खुशबू श्रीवास्तव
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता का आधार सत्य, निष्पक्षता और जनहित है। पत्रकार का धर्म सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जनता के सामने सच लाना है। लेकिन आज का सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर असली और नकली पत्रकार की पहचान कौन करेगा?
आज कुछ लोगों के गलत आचरण का दाग पूरे पत्रकारिता जगत पर लग जाता है। कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में निजी स्वार्थ साधते हैं, जबकि दूसरी ओर कई ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकार जनता के मुद्दों, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं को उजागर करने के कारण दबाव, मुकदमों और बदनामी का सामना करते हैं।
कई बार किसी पत्रकार पर आरोप लगते ही उसे "ब्लैकमेल पत्रकार" कह दिया जाता है, जबकि मामले की निष्पक्ष जांच पूरी भी नहीं हुई होती। आरोप और दोष सिद्ध होने में बड़ा अंतर होता है। यदि किसी ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन बिना प्रमाण किसी पत्रकार को अपराधी घोषित कर देना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
यह भी उतना ही सच है कि पत्रकारिता के नाम पर गलत कार्य करने वालों को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। ऐसे लोगों पर कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि समाज का भरोसा पत्रकारिता पर बना रहे। लेकिन इसी के साथ ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान भी सुनिश्चित होना चाहिए।
जब सच लिखने वाले पत्रकारों को धमकियां मिलें, मुकदमों का सामना करना पड़े या उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जाए, तब सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र और जनता के जानने के अधिकार का होता है।
आज जरूरत इस बात की है कि व्यक्ति नहीं, बल्कि तथ्य और साक्ष्य बोलें। पत्रकार की पहचान उसके कैमरे, आईडी कार्ड या सोशल मीडिया से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता, ईमानदारी और जनहित में किए गए कार्यों से होनी चाहिए।
क्योंकि जब सच बोलने वालों की आवाज़ दबने लगती है, तब लोकतंत्र भी कमजोर होने लगता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि कौन पत्रकार है, बल्कि सवाल यह है कि कौन सच के साथ खड़ा है।

