पूरी रकम नहीं मिली तो भी रजिस्टर्ड बिक्री विलेख रद्द नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट
बकाया राशि की वसूली का अधिकार बरकरार, लेकिन अधूरा भुगतान मात्र बिक्री को शून्य नहीं बनाता
राजेश धाकड़
इंदौर संपत्ति की रजिस्टर्ड बिक्री के बाद यदि खरीदार ने पूरी बिक्री राशि का भुगतान नहीं किया है, तो केवल इस आधार पर बिक्री विलेख को रद्द नहीं कराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिक्री विलेख के पंजीयन के समय पूरी कीमत का भुगतान होना अनिवार्य नहीं है। यदि पक्षकारों के बीच संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित करने की स्पष्ट मंशा थी और बिक्री विलेख विधिवत पंजीकृत हो चुका है, तो शेष राशि का भुगतान नहीं होने मात्र से बिक्री अपने आप अमान्य नहीं हो जाती।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में विक्रेता के पास बकाया बिक्री प्रतिफल की वसूली के लिए कानूनी उपाय उपलब्ध रहता है, लेकिन केवल भुगतान अधूरा रहने के आधार पर संपत्ति का स्वामित्व वापस लेने के लिए रजिस्टर्ड बिक्री विलेख को निरस्त नहीं कराया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने रजिया बेगम एवं अन्य बनाम नसिया बेगम अब्दुल एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट के उस निर्णय को पलट दिया, जिसमें बिक्री विलेखों को निष्प्रभावी मानते हुए मूल मालिकों के पक्ष में फैसला दिया गया था। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के निष्कर्षों को बहाल कर दिया।
दो बिक्री विलेखों से जुड़ा था विवाद
मामला वर्ष 1975 में निष्पादित किए गए दो बिक्री विलेखों से संबंधित था। दोनों संपत्तियों की कीमत 7-7 हजार रुपये तय की गई थी। खरीदार ने प्रत्येक सौदे में 2,500 रुपये का भुगतान किया था, जबकि 4,500 रुपये की शेष राशि इस उद्देश्य से अपने पास रखी गई थी कि उससे विक्रेताओं के विभिन्न संस्थानों और सरकारी विभागों के बकाया कर्ज का भुगतान किया जाएगा।
बाद में यह राशि संबंधित बकाया चुकाने में इस्तेमाल नहीं हुई। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच अलग-अलग समझौते हुए, जिनमें खरीदार ने शेष रकम देने और संबंधित कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी स्वीकार की।
विवाद बढ़ने पर विक्रेताओं ने अदालत का रुख किया और बिक्री विलेखों को रद्द करने तथा संपत्ति पर अपना स्वामित्व घोषित करने की मांग की।
ट्रायल कोर्ट ने बिक्री को माना प्रभावी
ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद माना कि बिक्री पूरी हो चुकी थी। केवल बिक्री मूल्य का कुछ हिस्सा बाकी रहने के आधार पर रजिस्टर्ड बिक्री विलेख को रद्द नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि बिक्री विलेख में ऐसी कोई स्पष्ट शर्त मौजूद नहीं थी, जिसके अनुसार शेष राशि का भुगतान नहीं होने पर बिक्री स्वतः रद्द हो जाएगी। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को बरकरार रखा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने बाद में निचली अदालतों के फैसले को पलट दिया और विक्रेताओं के पक्ष में निर्णय दिया। हाईकोर्ट ने माना कि बिक्री विलेख में दर्ज जिम्मेदारियां पूरी नहीं की गई थीं और संपत्ति पर विक्रेताओं के स्वामित्व को घोषित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 54 का किया उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 54 का उल्लेख करते हुए कहा कि बिक्री के लिए पूरी कीमत का भुगतान बिक्री विलेख के निष्पादन के समय ही किया जाना आवश्यक नहीं है।
कानून के अनुसार कीमत पूरी तरह चुकाई जा सकती है, भविष्य में भुगतान करने का वादा किया जा सकता है या कुछ रकम तत्काल देकर शेष रकम बाद में देने की सहमति हो सकती है।
शीर्ष अदालत ने पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी बिक्री की वैधता तय करने में सबसे महत्वपूर्ण बात पक्षकारों की वास्तविक मंशा है। इस मंशा को बिक्री विलेख की भाषा, पक्षकारों के आचरण और मामले में उपलब्ध अन्य साक्ष्यों के आधार पर समझा जाना चाहिए।
रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के बाद स्वामित्व का सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब रजिस्टर्ड बिक्री विलेख निष्पादित हो चुका हो और दस्तावेज से यह स्पष्ट हो कि पक्षकार संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित करना चाहते थे, तब केवल बिक्री मूल्य की कुछ राशि बकाया रहने से बिक्री को अमान्य नहीं माना जा सकता।
अर्थात, खरीदार द्वारा पूरी रकम का भुगतान न करना अपने आप में बिक्री विलेख को शून्य नहीं बनाता, जब तक कि दस्तावेज या परिस्थितियों से यह स्पष्ट न हो कि पक्षकारों ने बिक्री को भुगतान की किसी विशेष शर्त के अधीन रखा था।
बकाया रकम की वसूली का रास्ता खुला
शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि विक्रेता अपने बकाया बिक्री प्रतिफल की वसूली के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। यदि खरीदार ने तय रकम का भुगतान नहीं किया है, तो विक्रेता बकाया राशि की वसूली के लिए मुकदमा कर सकता है।
लेकिन केवल इस आधार पर कि बिक्री के समय पूरी रकम प्राप्त नहीं हुई, रजिस्टर्ड बिक्री विलेख को रद्द कराकर संपत्ति का स्वामित्व वापस लेने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों का फैसला बहाल किया
मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विक्रेताओं ने बिक्री के बाद बकाया रकम की वसूली का रास्ता अपनाने के बजाय बिक्री विलेखों को रद्द कराने का प्रयास किया था।
शीर्ष अदालत ने बिक्री को प्रभावी और अंतिम मानते हुए हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया तथा ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के निर्णय को बहाल कर दिया।
फैसले का सार: रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के बाद केवल पूरी बिक्री कीमत का भुगतान नहीं होने से संपत्ति की बिक्री स्वतः शून्य नहीं हो जाती। विक्रेता के पास बकाया राशि की वसूली का अधिकार रहता है, लेकिन बिक्री विलेख रद्द कराने के लिए केवल अधूरा भुगतान पर्याप्त आधार नहीं है। मामले में अंतिम निर्णय पक्षकारों की मंशा, बिक्री विलेख की शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

