सड़क हादसे: असली वजहों से मुँह मोड़ती रिपोर्टिंग

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( सोशल मीडिया से प्राप्त विचार)
सड़क दुर्घटनाओं की रिपोर्टिंग में अक्सर एक ही ढर्रा देखने को मिलता है। किसी भी हादसे के बाद अधिकांश अख़बार वही लिखते हैं जो उन्हें पुलिस ब्रीफिंग में बताया जाता है—
“सीट बेल्ट नहीं पहनी थी”, “वाहन की गति तेज थी”, “चालक नशे में था”।
लेकिन क्या वाकई हर सड़क हादसे की यही असली वजह होती है?
सोशल मीडिया (व्हाट्सएप) पर प्रसारित एक विचारशील टिप्पणी इस पूरी रिपोर्टिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। टिप्पणी में बताया गया है कि सड़क हादसों की सबसे बड़ी वजहें अक्सर खराब रोड इंजीनियरिंग, ब्लैक स्पॉट, गलत ढंग से खड़े भारी वाहन और सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती हैं—जिन पर न मीडिया ध्यान देता है, न सिस्टम।
हाल ही में इंदौर में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे में तीन मासूम बच्चों की जान चली गई। इस घटना के बाद लगभग सभी अख़बारों ने नशे, सीट बेल्ट और स्पीड को कारण बताया। लेकिन किसी भी रिपोर्ट में यह सवाल नहीं उठाया गया कि
सड़क पर खड़ा डंपर रेडियम रिफ्लेक्टर से लैस था या नहीं,
उसमें बैक लाइट चालू थी या नहीं,
और वह वाहन सड़क के किनारे था या बीच में खड़ा था।
आधी रात, कोहरा और धुंध के बीच यदि कोई भारी वाहन बिना बैक लाइट और रिफ्लेक्टिव रेडियम के सड़क पर खड़ा हो, तो सामान्य गति से चल रहा सतर्क चालक भी उसे समय रहते नहीं देख पाएगा। यह कोई बहाना नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा और इंजीनियरिंग की हकीकत है।
टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि रात के समय ड्राइविंग के दौरान सबसे बड़ा खतरा बेतरतीब खड़े डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ हैं, जो बिल्कुल दिखाई नहीं देते। हैरानी की बात यह है कि दो-पाँच रुपये के रेडियम रिफ्लेक्टर यदि इन वाहनों पर अनिवार्य रूप से लगा दिए जाएँ, तो सैकड़ों जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि डंपर मालिकों से जिम्मेदारी की उम्मीद करना अक्सर व्यर्थ साबित होता है। वहीं दूसरी ओर,
मीडिया गंभीर सवाल पूछने से बचता है,
पुलिस की सक्रियता अक्सर व्यस्त चौराहों पर गरीब मजदूरों के हेलमेट और काग़ज़ों के चालान तक सीमित रह जाती है,
जबकि प्रभावशाली और रसूखदार वाहन मालिक कार्रवाई से बचे रहते हैं।
टिप्पणी में यह सुझाव भी दिया गया है कि यदि प्रशासन से उम्मीद कम हो चुकी है, तो सामाजिक संगठनों और इंजीनियरों की संस्थाओं को आगे आना चाहिए।
टोल नाकों पर गुजरने वाले डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर मुफ्त रेडियम रिफ्लेक्टर लगाए जाएँ,
और हर शहर में ब्लैक स्पॉट, खतरनाक मोड़ और अनियंत्रित ढलानों की पहचान कर सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
अंत में, इस संदेश के माध्यम से पत्रकारों से भी आत्ममंथन की अपील की गई है—
हादसे के बाद सिर्फ प्रेस नोट पर निर्भर न रहें, बल्कि मौके पर जाकर हालात समझें और असली वजह सामने लाएँ। यही जिम्मेदार पत्रकारिता है और यही समाज के प्रति सच्ची जवाबदेही।
— सोशल मीडिया (WhatsApp) से प्राप्त विचार
प्रस्तुति: रणजीत टाइम्स

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