निर्वाज्य प्रेम की दैवी सम्पदा को प्राप्त करने का सहज साधन है सहजयोग
प. पू श्रीमाताजी प्रणित सहजयोग ध्यान हमें अपने-आपसे प्रेम करना सिखाता है। इस ध्यान के माध्यम से हम यह जान जाते हैं कि, में एक शुद्ध आत्मतत्व हूँ। यह आत्मस्वरूप, निर्गुण, निराकार, परम-प्रेमास्पद और आनंद का खजाना है, परंतु हम सब मानव इस खजाने से अनजान लोग हैं। पंरतु सहज योग में जब साधक को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है तब वह इस देवी प्रेम को अनुभूत कर सकता है। अर्थात् यह देवी प्रेम भी उसी साधक को अनुभूत होता है जिसके हृदय में परमात्मा के प्रति, या खुद के आत्मस्वरूप के प्रति निमिषमात्र भी श्रद्धा हो। 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्' इस उक्ती के अनुसार साधक तत्क्षण इस दैवीय प्यार को पा सकता है और एक बार अगर उसने इस अमृत को चख लिया तो वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ता है। हर दिन के नियमित ध्यान से इस दैवी प्रेम में स्थित होता है।
प पू श्रीमाताजी के अमृतवचनानुसार यह मन की वह अवस्था है जिसे प्राप्त करना होता है। वहाँ आप किसी का न्याय नहीं करते, किसी का भी नहीं । आपको पता होता है कि कोई दोष है लेकिन आप उसे अपने प्रेम से ढंक देते हैं और उसे एक सुंदर मोती बना देते है। जैसे सूर्य का प्रकाश जो हर ओर फैलता है वह किसी का दोष नहीं देखता न ही पत्तों की गिनती करता है, वह केवल देता है, और देता ही रहता है। उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर हम सभी को उस अवस्था को प्राप्त करना चाहिए, जहा हम केवल देते रहें बिना किसी मैं की भावना के, बिना भौतिक विचार के और बिना उन निरर्थक स्थूल तरीकों के जिनसे लोग, जीवन को देखते हैं।
अपने हृदय को पिघलने दीजिये प्रेम को बहने दीजिए और उसका आनंद लीजिए। यदि दूसरे आपसे क्रोधित हो जायें तो क्या हुआ यदि वे कुछ निरर्थक बात कहें तो क्या हुआ आप स्वयं के आनंद में स्थित हैं। यही वास्तविक प्रेम है। यह ऐसा प्रेम है जो आपको क्षमाभाव प्रदान करता है, आत्मविश्वास व आत्मसम्मान प्रदान करता है।
शुद्ध इच्छा रखने वाले प्रत्येक साधक को यह निर्वाज्य प्रेम सहजयोग ध्यान के माध्यम से अत्यंत सहजता से प्राप्त हो सकता है। नजदीकी सहजयोग ध्यान केंद्र से संबंधित जानकारी टोल फ्री नंबर18002700800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

