पंच ज्ञानेन्द्रियों व मन को सहस्त्रार में लय करने की कला है सहजयोग
पांचों इन्द्रिय छठामन, सम संगत सूचंत।
कहै कबीर जग क्या करे, सातों गांठ निश्चिंत |
संत कबीर
सब संत कवीयों ने आत्मसाक्षात्कार रूपी मधुर फल को चखा था, इसलिये उस अनुभूति का वर्णन वे सभी इतनी सूक्ष्मता से कर सके। जब साधक को आत्मज्ञान अर्थात् स्वरूपज्ञान होता है तो साधक को जो मधुर अनुभूतियां होती हैं इसका वर्णन करते हुए संत कबीर लिखते हैं, जो साधक अपनी पांचों ज्ञानेन्द्रियों को यानि कि आंख, कान, नाक जिव्हा तथा त्वचा और छठे मने को सातवें 'सहस्त्रार चक्र' पर स्थित करता है अपनी ज्ञानेन्द्रियों को अंतर्मुखी करने की कला सीखता है, हर दिन के ध्यान योग की अभ्यास साधना में पारंगत होकर मनोजयी बनता है। सांसारिक लोभ, मोह,माया, वासना उसका कुछ भी बिगाड़ नही सकती। इस प्रकार वो मनोजयी अर्थात् मन को जीतने वाला बन जाता है।
प. पू. श्रीमाताजी द्वारा प्रणित सहज योग भी हमें मनोजयी होने की कला सिखाता है। कैसे ? सहजयोग एक स्व के तंत्र को जानने का शास्त्र है, इस योग के माध्यम से हम हमारे सूक्ष्म शरीर को जानते हैं। सहजयोग में जब हमें हमारा स्वरूप साक्षात्कार प्राप्त होता है, तो हमारी पाँचे ज्ञानेन्द्रियां अंतर्मुखी बन जाती हैं। मन एकाग्र हो जाता है और साधक अपनी माँ स्वरुपिनी कुंडलिनी शक्ति का उर्ध्वगमन महसूस कर सकता है। यह कुंडलिनी शक्ति मूलाधार में पृथ्वीतत्व को, स्वाधिष्ठान में अग्नितत्व को, नाभी में जल तत्व को, अनहद में वायुतत्व को विशुद्धि में आकाश और आज्ञा चक्र में मनतत्व को लांघकर सहस्त्रार चक्र में सदाशिव जा मिलती है। जिस अंतरंग अनुभव, का वर्णन हम कर रहे हैं, इसे विश्व के सभी सहजयोगियों ने पाया है और इस ज्ञान व योग की प्राप्ति के पश्चात् सभी साधक निर्भय, आनंदमय होकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस आनंद को प्राप्त करने तथा
कुंडलिनी जागरण द्वारा आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने हेतु www.sahajayoga.org.in और टोल फ्री नम्बर 18002700800 पर सम्पर्क करें।

