सुख और दुःख के द्वंद्व से परे निर्मल निरानंद का अनुभव है सहजयोग
सहजयोग की साधना में कुण्डलिनी जागरण को आत्म-साक्षात्कार की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। जब कुण्डलिनी शक्ति साधक के भीतर जागृत होकर विभिन्न चक्रों को पार करती हुई सहस्रार तक पहुँचती है, तब चेतना एक ऐसे अनुभव की ओर अग्रसर होती है जिसे शब्दों में पूर्णतः व्यक्त करना कठिन है। श्री माताजी ने इस अवस्था के आनन्द को अत्यंत सुंदर ढंग से “निरानन्द” कहा है।
सामान्य जीवन में हम आनन्द को किसी वस्तु, व्यक्ति, उपलब्धि या परिस्थिति से जोड़कर देखते हैं। कोई इच्छा पूरी होती है तो हमें प्रसन्नता मिलती है; कोई प्रिय वस्तु प्राप्त होती है तो सुख अनुभव होता है। परंतु यह आनन्द बाहरी कारणों पर निर्भर होता है और इसलिए स्थायी नहीं रहता। सहस्रार पर पहुँचने वाला आनन्द इससे बिल्कुल भिन्न है। यह किसी बाहरी वस्तु से प्राप्त नहीं होता, बल्कि हमारे अपने भीतर स्थित आत्मा के अनुभव से प्रकट होता है।
श्री माताजी के अमृतवाणी के अनुसार,
“जब कुण्डलिनी सहस्रार पर आती है तो जो आनन्द प्राप्त होता है उसका नाम ‘निरानन्द’ है। निः का अर्थ आनन्द के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, निरानन्द!”
यह कथन अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक अर्थ रखता है। यहाँ “निरानन्द” को केवल आनन्द का अभाव समझना उचित नहीं है। इसके विपरीत, यह उस अवस्था की ओर संकेत करता है जहाँ आनन्द इतना सूक्ष्म, सहज और निरपेक्ष हो जाता है कि वह किसी कारण या अपेक्षा से बंधा नहीं रहता। वहाँ सुख और दुःख के द्वंद्व से परे एक शांत, निर्मल और संतुलित चेतना का अनुभव होने लगता है।
सहस्रार चक्र मानव चेतना के उत्कर्ष का प्रतीक है। जब कुण्डलिनी इस केंद्र को प्रकाशित करती है, तब साधक के भीतर विचारों की निरंतर गति शांत होने लगती है। मन वर्तमान क्षण में स्थिर होता है और व्यक्ति अपने भीतर की शांति तथा आत्मिक अस्तित्व को अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव कर सकता है।
“निरानन्द” इसलिए केवल कोई भावनात्मक प्रसन्नता नहीं, बल्कि निरपेक्ष आनन्द की अनुभूति है—ऐसा आनन्द जो लेने से नहीं, भीतर जागने से प्रकट होता है। सहजयोग में यह अवस्था साधक को बाहरी संसार से भागने के लिए नहीं, बल्कि उसी संसार में रहते हुए अपने भीतर की शांति और संतुलन को पहचानने की प्रेरणा देती है।
कुण्डलिनी का सहस्रार तक आरोहण हमें यही संदेश देता है कि जिस आनन्द की खोज हम बाहर करते हैं, उसका वास्तविक स्रोत हमारे भीतर ही विद्यमान है। आत्म-साक्षात्कार के उस क्षण में चेतना जब सहस्रार पर स्थापित होती है, तब आनन्द किसी उपलब्धि का परिणाम नहीं रहता वह स्वयं हमारे अस्तित्व का स्वाभाविक स्वरूप बन जाता है। यही है — निरानन्द।
सहजयोग ध्यान नि:शुल्क है। सहजयोग के बारे में अधिक जानकारी हेल्पलाइन नंबर 18002700800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

