आत्मतत्व में चित्त को स्थिर करने की पद्धति है सहजयोग

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ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। श्रीमद्भगवद्गीता 
 श्रीमद्भगवद्गीता  में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पांचों ज्ञानेन्द्रियों को आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। और हम बाहरी संसार के आकर्षण में फिर उस परम प्रेम तत्व को पहचान नहीं पाते । 
श्री माताजी प्रणित सहजयोग हमें इसी आत्मतत्व की अनुभूति प्रदान करता है। साधारणतया हम अपने आप से अपने चित्त को अपने हृदय में स्थित और स्थिर नहीं कर सकते। सहज योग में जब साधक को आत्म साक्षात्कार प्राप्त होता है तब वह साधक अपने चित्त को अपने हृदय में और हृदय चक्र की पीठ जो सहस्त्रार चक्र में है वहां कुछ क्षणों के लिए स्थित कर सकता है अपनी चित्त वृत्तियों को स्थिर करने की परम अनुभूति कर सकता है। आत्म साक्षात्कार की यह घटना समझाते हुए परम पूज्य श्री माताजी कहते हैं, 
कि सभी योग अंततः इस बात पर समाप्त होते हैं कि आपका अस्तित्व और आपका चित्त एक हो जाए उदाहरण के लिए अभी आप मुझे सुन रहे हैं और आपका चित्त बाहर की ओर है अर्थात आप मुझे बाहर से देख रहे हैं पर यदि मैं आपसे कहूं कि अपने चित्त को बाहर से भीतर ले जाओ वहीं से जहां से तुम मुझे सुन रहे हो तो क्या आप ऐसा कर सकते हैं नहीं कर सकते हैं यह चित्त मनुष्य के बाहर चला जाता है और यही समस्या है कि हम अपना चित्त भीतर नहीं ले जा सकते हैं इसी कारण अपना स्वयं से मिलन स्थापित नहीं हो पता लेकिन यह मिलन स्थापित होना ही चाहिए यदि आप यह अनुभव करें कि हमारे भीतर कोई ऐसा है जो हमें हर समय देख रहा है हम जो कुछ भी करते हैं उसका निरीक्षण कर रहा है वह जो हमारे अंदर है और जो बाहर की ओर देख रहा है परंतु हम उस व्यक्तित्व तक नहीं जा सकते । हमारे और उस व्यक्तित्व के बीच  एक अंतराल है इसी व्यक्तित्व को अनेक धर्म ग्रंथों ने आत्मा या स्पिरिट कहा है लोगों ने इसके बारे में बताया है कि हमें अपनी आत्मा को प्रकट करना है अर्थात हमारा चित्त इस आत्मा के साथ एक हो जाना चाहिए यह सभी धर्म ग्रंथों में कहा गया है जब हम आत्मा को पहचानते हैं तो स्वयं को जान जाते हैं तभी हमारा पुनर्जन्म होता है और यही आत्म साक्षात्कार है। और इस आत्म साक्षात्कार प्राप्ति के बाद साधक परमानंदमय हो जाता है वह हृदय से प्रार्थना करता है कि हे करुणामय  मां मैं ना मंत्र जानता हूं ना तंत्र आपका मैं कैसे पूजन करूं आपको क्या समर्पित करूं इस बात का भी मुझे कुछ ज्ञान नहीं है। पर है मां आपने मुझे परम चैतन्य से आशीर्वादित किया है जिसके कारण चैतन्य की शीतल लहरियां मेरे हाथों से तालू भाग से बहने लगी हैं इसलिए मैं अपने आप को इस धरती का सबसे भाग्यवान व्यक्ति समझता हूं और आपके श्री चरणों पर प्रार्थना अर्पित करता हूं कि आप मुझे सदैव अपनी छत्रछाया में रखें।
सहजयोग ध्यान  की अधिक जानकारी टोल-फ्री नंबर: 1800 2700 800 या www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

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