सहजयोग ध्यान ‘ममकार’ से मुक्ति और आत्मज्ञान का सूक्ष्म मार्ग प्रदान करता है
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥”
भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का यह प्रथम श्लोक जीवन के भीतर चलने वाले शुभ और अशुभ के संघर्ष की ओर संकेत करता है। परमपूज्य श्रीमाताजी निर्मला देवी द्वारा प्रतिपादित सहजयोग के अनुसार, आत्मबोध और आत्मज्ञान की प्राप्ति ही इस आंतरिक संघर्ष को समझने और जीवन को सही दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
सहजयोग में आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर स्थित आत्मतत्व का अनुभव करता है। यही आत्मतत्व हमारे जीवन में क्या उचित है और क्या अनुचित, इसका सूक्ष्म बोध प्रदान करता है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को आत्मज्ञान और स्वधर्म में स्थित होने का मार्ग दिखाया।
कुरुक्षेत्र — कर्मभूमि का प्रतीक
इस श्लोक में वर्णित ‘कुरुक्षेत्र’ को कर्म करने की भूमि के रूप में समझा जा सकता है। हमारा दैनिक जीवन भी एक कर्मभूमि है, जहाँ हमें अनेक भूमिकाएँ निभानी होती हैं। परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में अपने दायित्वों का ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से निर्वहन करना ही जीवन का धर्म है।
यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ केवल किसी बाहरी धार्मिक पहचान से नहीं है। मानवता धर्म, राजधर्म, प्रजाधर्म, पति-पत्नी धर्म, पुत्रधर्म, गुरु अथवा आचार्य धर्म—जीवन में हमारी विभिन्न भूमिकाओं के अनुरूप अपने कर्तव्यों को उचित प्रकार से निभाना भी धर्म का ही स्वरूप है।
प्रश्न यह उठता है कि हमें कौन-सा कर्म करना चाहिए और कौन-सा कर्म त्याग देना चाहिए? सहजयोग में जब मनुष्य का आत्मतत्व जागृत होता है, तब उसके भीतर सही और गलत को पहचानने की सूक्ष्म विवेकशक्ति विकसित होती है। आत्मज्ञान के प्रकाश में व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय अधिक स्पष्टता से ले सकता है।
‘मामकाः’ और ममकार का सूक्ष्म अर्थ
भगवद्गीता के इस श्लोक में ‘मामकाः’ शब्द विशेष ध्यान आकर्षित करता है। सहजयोग की व्याख्या में इसे ‘ममकार’, अर्थात् ‘मेरा-मेरा’ करने वाली वृत्ति के रूप में देखा जाता है।
राजा धृतराष्ट्र का अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति अंधा मोह इस ममकार का उदाहरण माना जाता है। अत्यधिक आसक्ति और मोह व्यक्ति के विवेक को प्रभावित कर सकते हैं और उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। इसके विपरीत, ‘पाण्डव’ शब्द को पाण्डु से जोड़ते हुए शुभ, निर्मल और पवित्र प्रवृत्तियों का प्रतीक माना जा सकता है। इस प्रकार हमारे भीतर भी शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों के बीच निरंतर एक सूक्ष्म संघर्ष चलता रहता है।
अहंकार और अति-मोह से मुक्ति का मार्ग
सहजयोग ध्यान के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर चलने वाली इन प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास करता है। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात साधक यह अनुभव कर सकता है कि उसके भीतर कौन-सी प्रवृत्ति उसे संतुलन, शांति और धर्म की ओर ले जा रही है तथा कौन-सी प्रवृत्ति उसके आध्यात्मिक विकास में बाधा बन रही है।
विशेष रूप से आज्ञाचक्र से जुड़े अहंकार और अति-मोह जैसी प्रवृत्तियों को संतुलित करने के लिए नियमित ध्यान को महत्वपूर्ण माना जाता है। ध्यान के माध्यम से मन को शांत व अंतर्मुखी बनाकर व्यणंक्ति अपने भीतर के सूक्ष्मज्ञान व आनंद का अनुभव प्राप्त करता है। सहजयोग का उद्देश्य किसी बाहरी पहचान को बदलना नहीं, बल्कि मनुष्य को अपने भीतर स्थित आत्मतत्व से जोड़ना और जीवन में संतुलन, विवेक एवं आंतरिक शांति का अनुभव कराना है।
नियमित सहजयोग ध्यान की इस यात्रा से जुड़ने के लिए अधिक जानकारी टोल-फ्री नंबर: 1800 2700 800 या www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

