सहज योग ध्यान: संतुलित जीवन का सहज मार्ग

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मनुष्य का जीवन समस्याओं से अछूता नहीं है। किसी को शारीरिक कठिनाइयाँ परेशान करती हैं, तो कोई मानसिक तनाव से जूझता है और किसी के जीवन में आर्थिक अभाव चुनौती बनकर सामने आता है। बीमारी, बुढ़ापा, निर्बलता, सम्मान को लगी ठेस, पारिवारिक परिस्थितियाँ अथवा विरोध—जीवन में किसी न किसी रूप में समस्याएँ बनी रहती हैं।
लौकिक जीवन में तन, मन और धन को सुख के प्रमुख आधार माना जाता है। शरीर स्वस्थ हो, मन प्रसन्न हो और जीवन में आवश्यक संसाधनों का अभाव न हो, तो व्यक्ति स्वयं को सुखी अनुभव करता है। लेकिन इन परिस्थितियों से मिलने वाला सुख स्थायी नहीं होता। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं और हमारी सोच भी अनेक प्रकार की चिंताओं एवं समस्याओं को जन्म देती है। ऐसे में स्थायी शांति और संतुलन की खोज आवश्यक हो जाती है।
सहज योग ध्यान इसी आंतरिक संतुलन और आत्मिक उत्थान का सहज मार्ग माना जाता है। कुंडलिनी जागरण के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त कर साधक धीरे-धीरे संतुलित अवस्था की ओर बढ़ता है। वह न तो भविष्य की अनावश्यक चिंता में उलझता है और न ही अतीत की घटनाओं से स्वयं को लगातार प्रताड़ित करता है। वर्तमान में रहते हुए संतुलित और तनावमुक्त जीवन जीने की क्षमता विकसित होती है।
सहज योग ध्यान की विशेषता इसकी सरलता है। इसे सीखना आसान है और सहज योग ध्यान केंद्रों के द्वार सभी साधकों के लिए खुले रहते हैं। नियमित ध्यान से व्यक्ति की सोच में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। हृदय चक्र के संतुलन से स्वभाव में सरलता, शांति और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है। यह परिवर्तन केवल बाहरी व्यवहार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व को भी प्रभावित करता है। 
    जब मन शांत और संयमित होता है, तब किसी भी परिस्थिति को अधिक स्पष्टता से समझने और उसके उचित समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की क्षमता विकसित होती है। व्यक्ति समस्याओं में उलझने के बजाय उन्हें सहजता से स्वीकार कर समाधान की ओर बढ़ना सीखता है।
    आत्मोत्थान के बाद की प्रार्थना भी व्यक्ति को एक नई अनुभूति प्रदान करती है। चैतन्य की अनुभूति के साथ व्यक्ति समाधान की निरंतर चिंता करने के बजाय संतोष और विश्वास की अवस्था में रहने लगता है। ध्यान के अभ्यास से विकसित आत्मविश्वास, सरलता और शांत प्रकृति व्यक्ति को प्रभावी बनाती है। इसका सकारात्मक प्रभाव उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है। हृदय चक्र से विकसित आत्मविश्वास के कारण व्यक्ति अपनी बात शांतिपूर्वक और प्रभावी ढंग से रखने में सक्षम होता है। संतों ने इसी आंतरिक स्थिति को आनंद की अवस्था कहा है।
सहज योग की प्रणेता एवं परमपूज्य श्री माताजी निर्मला देवी का संदेश है— “निर्विचार अवस्था में जो भी घटित होता है, वह प्रबुद्ध और प्रकाशमान होता है।”
आज के तनावपूर्ण और तेजी से बदलते जीवन में सहज योग ध्यान व्यक्ति को स्वयं के भीतर झाँकने, मन को शांत करने और जीवन में संतुलन स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। आत्मसाक्षात्कार के इस सहज मार्ग से जुड़कर हम बाहरी परिस्थितियों को बदलने के साथ-साथ अपनी आंतरिक दृष्टि को भी विकसित कर सकते हैं।
यदि आप भी आत्मिक शांति, संतुलन और आनंद की इस यात्रा से जुड़ना चाहते हैं, तो अपने नज़दीकी सहज योग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा वेबसाइट sahajayoga.org.in  से प्राप्त कर सकते हैं। सहज योग पूर्णतया निःशुल्क है।

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