सोचो… भगवान क्या चाहता है?
सब कहते हैं—
हमें भगवान से बहुत प्यार है,
कोई मंदिर में उसे ढूँढता है,
कोई मस्जिद में सिर झुकाता है,
कोई गुरुद्वारे में अरदास करता है,
कोई गिरजाघर में प्रार्थना करता है।
पर एक सवाल दिल से पूछो—
अगर भगवान से इतना प्यार है,
तो इंसान, इंसान से नफ़रत क्यों करता है?
जिस भगवान ने सबको बनाया,
उसने कहाँ किसी में फर्क बताया?
किसी को हिंदू, किसी को मुस्लिम,
किसी को अमीर, किसी को गरीब—
ये दीवारें तो हमने बनाई हैं,
भगवान ने तो बस इंसान बनाया है।
हम भगवान को फूल चढ़ाते हैं,
पर इंसानों के रास्तों में काँटे बिछाते हैं।
भगवान के आगे हाथ जोड़ते हैं,
और बाहर आकर किसी का दिल तोड़ते हैं।
पत्थर की मूर्ति में भगवान दिख जाता है,
फिर रोते हुए इंसान में क्यों नहीं?
मंदिर की घंटी सुनाई देती है,
पर किसी भूखे की आवाज़ क्यों नहीं?
कभी ये मत सोचो
कि तुम भगवान से क्या चाहते हो,
एक दिन बैठकर ये भी सोचो—
भगवान तुमसे क्या चाहता है?
शायद वह चाहता है—
किसी भूखे को रोटी दे दो,
किसी रोते हुए को हँसा दो,
किसी गिरे हुए को उठा दो,
किसी अकेले का हाथ थाम लो,
और हो सके तो
अपने दिल से नफ़रत मिटा दो।
क्योंकि भगवान तक पहुँचने का
सबसे छोटा रास्ता शायद
किसी धर्मस्थल से नहीं,
किसी इंसान के दिल से होकर जाता है।
जिस दिन इंसान को
इंसान से प्यार हो जाएगा,
शायद उस दिन भगवान भी मुस्कुराकर कहेगा—
“अब तुम समझे…
मैं तुमसे क्या चाहता था।”

— कवि गोपाल गावंडे

