सहजयोग : आत्मसाक्षात्कार से धर्म की स्थापना का महायोग

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परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी प्रणीत सहजयोग ध्यान मनुष्य को बाह्य भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठाकर उसके वास्तविक आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कराने का सरल एवं सहज मार्ग प्रदान करता है। सामान्यतः हमारी पंच ज्ञानेंद्रियाँ केवल बाहरी संसार का अनुभव कराती हैं, किंतु आत्मसाक्षात्कार के पश्चात साधक अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना, शांति और सौंदर्य का अनुभव करने लगता है। जब हमारी आदि शक्ति श्री कुंडलिनी जागृत होकर सहस्रार तक आरोहण करती है, तब हमारे भीतर धर्म का वास्तविक जागरण होता है। यह धर्म किसी मत, पंथ या बाहरी आडंबर का नाम नहीं, बल्कि आत्मा में स्थित होकर सत्य, प्रेम, करुणा, पवित्रता और विवेक जैसे दिव्य गुणों का सहज प्रस्फुटन है। इन गुणों का आनंद प्रत्येक साधक को स्वयं अनुभव करना होता है; इन्हें किसी पर थोपा या साझा नहीं किया जा सकता।
     श्री माताजी इस सत्य को अत्यंत सुंदर दृष्टांत द्वारा समझाती हैं। वे कहती हैं कि जैसे मोती स्वयं अपने सौंदर्य को नहीं देख सकता, सूर्य अपनी ज्योति को नहीं देख सकता और आकाश अपनी विशालता का अनुभव नहीं कर सकता, उसी प्रकार परमात्मा भी अपने सौंदर्य को देखने के लिए एक दर्पण चाहता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने इस संपूर्ण सृष्टि और अंततः मनुष्य की रचना की। किंतु मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को न जानने के कारण भौतिकता, नशे, अतिवाद और अनेक विकारों में उलझकर अपने अमूल्य जीवन का उद्देश्य भूल जाता है। श्री माताजी बताती हैं कि उन्होंने साधकों के लिए उस दिव्य दर्पण की खोज की है—वह है आत्मा का दर्पण। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात जब साधक अपना चित्त आत्मा में स्थिर करता है, तब उसे अपने भीतर का निर्मल एवं दिव्य प्रतिबिंब दिखाई देने लगता है। उसी क्षण कुविचार, कुसंस्कार और विनाशकारी प्रवृत्तियाँ सहज ही समाप्त होने लगती हैं और साधक आनंद, शांति तथा आत्मिक उत्कर्ष की अनवरत यात्रा पर अग्रसर हो जाता है।
नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in से  प्राप्त कर सकते हैं।

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