सांदीपनि स्कूल बना अव्यवस्थाओं का अखाड़ा, सपनों की पाठशाला में लापरवाही का पाठ

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करोड़ों की लागत से बने उत्कृष्ट विद्यालय में बच्चों से लगवाई जा रही झाड़ू, कई कक्षाएं शिक्षक विहीन, लैब पर ताले और हर तरफ गंदगी
महेन्द्र मालवीय रणजीत टाईम्स
 मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की महत्वाकांक्षी सांदीपनि विद्यालय योजना का उद्देश्य सरकारी बच्चों को निजी स्कूलों जैसी आधुनिक शिक्षा और बेहतर सुविधाएं देना है। लेकिन बुरहानपुर जिले के शाहपुर स्थित सांदीपनि विद्यालय की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। यहां मासूम बच्चों से झाड़ू लगवाई जा रही है, कई कक्षाओं में शिक्षक नहीं हैं, लैब पर ताले लटके हैं, परिसर में गंदगी पसरी है और जिम्मेदार अधिकारी नदारद मिले। हमारी टीम की यह विशेष पड़ताल देखिए...
यह है शाहपुर का सांदीपनि विद्यालय... जहां करीब 1300 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यहां 22 नियमित और 13 अतिथि शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से अब भी शिक्षकों की कमी बनी हुई है। करोड़ों की लागत से तैयार इस मॉडल स्कूल में व्यवस्थाएं आदर्श होने की बजाय बदहाल नजर आईं,जैसे ही हमारी टीम स्कूल परिसर में पहुंची, सबसे पहले जो तस्वीर सामने आई, उसने सभी को हैरान कर दिया। कक्षा तीसरी के मासूम छात्र हाथों में झाड़ू लेकर स्कूल की सफाई करते मिले। बच्चों से परिसर और मैदान का कचरा भी उठवाया जा रहा था।
आखिर सवाल यह है कि क्या इन बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल भेजा गया है... या सफाई करने के लिए?जब इस संबंध में शिक्षिका आशा वानखेड़े से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि चपरासी नहीं आया था, इसलिए बच्चों से झाड़ू लगवाई गई। जबकि विद्यालय में सफाई के लिए चार चपरासी पदस्थ हैं। ऐसे में बच्चों से सफाई करवाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

स्कूल परिसर में आगे बढ़ने पर गंदगी की एक और तस्वीर सामने आई। मैदान और बरामदों में जगह-जगह गुटखा और पान मसाले के रैपर पड़े मिले। सवाल यह भी उठता है कि आखिर यह गुटखा पाउच स्कूल परिसर में आए कैसे? क्या इनका उपयोग छात्र करते हैं या फिर कोई और? जब हमारी टीम कक्षा पांचवीं में पहुंची तो दोनों सेक्शन शिक्षक विहीन मिले। बच्चे अकेले बैठे थे। कुछ देर बाद शिक्षक पहुंचे और उन्होंने बताया कि वे ई-अटेंडेंस लगाने गए थे। लेकिन सवाल यह है कि सुबह साढ़े दस बजे शुरू होने वाले विद्यालय में 11 बजकर 15 मिनट तक उपस्थिति दर्ज करना आखिर किस व्यवस्था का हिस्सा है? इतना ही नहीं, बच्चों की कक्षा में कबाड़ तक रखा हुआ मिला।

पड़ताल आगे बढ़ी तो अव्यवस्थाओं की परतें खुलती चली गईं। बरामदों में धूल, कमरों में गंदगी, STEM लैब धूल से अटी हुई, आर्ट एंड क्राफ्ट कक्ष पर ताला और आईसीटी लैब भी बंद मिली। जिन कंप्यूटरों से बच्चों को डिजिटल शिक्षा मिलनी थी, वे धूल फांकते नजर आए। फिजिक्स लैब के उपकरण भी उपयोग के इंतजार में पड़े मिले,कक्षा 11वीं कॉमर्स में भी विद्यार्थियों को शिक्षक का इंतजार था। अंग्रेजी का पीरियड होना था, लेकिन अतिथि शिक्षक का कार्यभार ही नहीं मिला था। नतीजा... बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी।
कक्षा आठवीं में एक और तस्वीर सामने आई। शिक्षक नरेंद्र विद्यार्थियों को पढ़ाने की बजाय मोबाइल फोन पर व्यस्त मिले। पूछने पर उन्होंने स्वीकार किया कि वे फोन पर बात कर रहे थे, जबकि विद्यालय में कक्षा के दौरान मोबाइल का उपयोग प्रतिबंधित माना जाता है।
जब हमारी टीम प्राचार्य कक्ष पहुंची तो वहां भी जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं थे। कार्यालय में पंखे और लाइटें बेवजह चल रही थीं। कैमरा देखते ही कर्मचारियों ने स्विच बंद किए, लेकिन कोई भी कैमरे के सामने कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ।

सवाल केवल एक स्कूल का नहीं... बल्कि उस भरोसे का है, जिसके साथ गरीब और ग्रामीण परिवार अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए सांदीपनि विद्यालय भेजते हैं।
जब बच्चों के हाथों में किताबों की जगह झाड़ू हो...
जब स्मार्ट लैब पर ताले लटके हों...
जब कक्षाएं शिक्षक विहीन हों...
जब परिसर गुटखे के रैपर और धूल से भरा हो...
और जब जिम्मेदार अधिकारी ही अनुपस्थित मिलें...
तो फिर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य आखिर कैसे पूरा होगा? पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी रोहिणी पवार केवल जांच और लिखित कार्रवाई की बात करती रहीं, लेकिन विद्यालय प्रबंधन की लापरवाही पर स्पष्ट जवाब देने से बचती नजर आईं।
अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन इन लापरवाहियों पर क्या कार्रवाई करता है... और क्या शाहपुर का सांदीपनि विद्यालय वास्तव में बच्चों के सपनों की पाठशाला बन पाएगा... या फिर अव्यवस्थाओं का अखाड़ा बना रहेगा।

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