चाय की दुकान खोलूं या आलू बड़ा बेचूं...

राजेश धाकड़
सोच रहा हूं पत्रकारिता छोड़कर कोई धंधा कर लूं। चाय की दुकान खोलूं या आलू बड़ा बेचूं। कम से कम वहां मेहनत का हिसाब तो साफ रहेगा। सुबह आलू उबालो, दोपहर तक बड़े तलो, शाम को पैसे गिनो और रात को चैन की नींद सो जाओ। यहां पत्रकारिता में सुबह खबर ढूंढो, दिनभर फोन घुमाओ, शाम को खबर लिखो और रात को यह सोचते हुए सो जाओ कि आखिर मिला क्या?
पत्रकारिता का हाल अब ऐसा हो गया है कि बच्चों को मैलोडी दिलाने के लिए भी जेब टटोलनी पड़ती है। झालमुड़ी खाने का मन करे तो पहले बैंक बैलेंस देखना पड़ता है। कभी-कभी तो लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा कमजोर हालत पत्रकारों की अर्थव्यवस्था की है। फर्क सिर्फ इतना है कि देश का बजट संसद में पेश होता है और पत्रकार का घाटा उसकी जेब में।
आजकल प्रेस कॉन्फ्रेंस भी बड़ी दिलचस्प चीज हो गई हैं। पहले पत्रकार खबर लेने जाता था, अब प्रवेश लेने जाता है। अगर गलती से काले कपड़े पहनकर पहुंच गए तो सुरक्षा कर्मी ऐसे घूरते हैं जैसे आप सवाल पूछने नहीं, सरकार गिराने आए हों।
यदि कोई पत्रकार हिम्मत करके जनता के सवाल पूछ ले तो जवाब मिलता है—“आज का विषय यह नहीं है।” यानी जनता की समस्या अगर निर्धारित विषय नहीं है, तो जनता भी निर्धारित महत्व की नहीं है।
राजनीति में भी बड़ा बदलाव आया है। कभी संगठन सर्वोपरि हुआ करता था। कार्यकर्ता पार्टी का नाम लेकर गर्व महसूस करता था। नेता कहते थे कि संगठन बड़ा है, व्यक्ति छोटा। लेकिन आज कई जगह दृश्य कुछ उल्टा दिखाई देता है। संगठन पीछे खड़ा दिखाई देता है और व्यक्ति सबसे आगे।
ऐसे समय में बार-बार याद आते हैं । वह अटल जो राजनीति में मर्यादा का पर्याय थे। वह अटल जो विरोधियों का सम्मान करते थे। वह अटल जिनके पास करोड़ों का वैभव नहीं था लेकिन करोड़ों लोगों का सम्मान था।
उन्होंने राजनीति को संवाद दिया, लोकतंत्र को असहमति का अधिकार दिया और सवालों को लोकतंत्र की ताकत बताया। लेकिन आज हालात देखकर कभी-कभी लगता है कि अटल की राजनीति और आज की राजनीति के बीच वर्षों का नहीं, सदियों का अंतर आ गया है।
सत्ता का सुख भी बड़ा विचित्र होता है। यह आदमी को इतना ऊंचा उठा देता है कि उसे नीचे खड़ी जनता दिखाई देना बंद हो जाती है। उसे लगता है कि तालियां हमेशा बजती रहेंगी, जयकारे हमेशा लगते रहेंगे और इतिहास हमेशा उसकी प्रशंसा करता रहेगा। लेकिन इतिहास बड़ा निर्मम होता है। वह केवल कर्मों का हिसाब रखता है।
जो लोग आज आलोचना से डरते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में सवाल दुश्मनी नहीं होते। सवाल लोकतंत्र का स्वास्थ्य परीक्षण होते हैं। जिस दिन सवाल पूछने वाले खत्म हो जाएंगे, उसी दिन लोकतंत्र का बुखार बढ़ना शुरू हो जाएगा।
इसलिए अभी चाय की दुकान खोलने का फैसला टाल दिया है। आलू बड़ा भी अभी नहीं बेचेंगे। क्योंकि अगर सारे पत्रकार चाय बेचने लगेंगे तो सत्ता से सवाल कौन पूछेगा? अगर सभी कलम छोड़कर कढ़ाई पकड़ लेंगे तो जनता की आवाज कौन बनेगा?
हां, पत्रकारिता अब पहले जैसी नहीं रही। सम्मान कम हुआ है, संघर्ष बढ़ा है, आय घटी है और अपेक्षाएं बढ़ी हैं। लेकिन फिर भी उम्मीद बाकी है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि सत्ता से बड़ी कोई चीज है तो वह जनता है, और जनता की आवाज से बड़ा कोई हथियार है तो वह एक ईमानदार पत्रकार की कलम।
जब तक सवाल जिंदा हैं, तब तक पत्रकारिता भी जिंदा है। और जिस दिन सवाल मर गए, उस दिन लोकतंत्र केवल एक सरकारी पोस्टर बनकर रह जाएगा।

